20. पृथक कर्नाटक प्रांत का गठन - Page 224

पृथक कर्नाटक प्रांत का गठन 207

अब पदाधिकारियों की बात करें। दोनों सदनों को मिलाकर 16 पदाधिकारी हैं। अब अपनी वास्तविक जनसंख्या के आधार पर सीटों की उपयुक्त संख्या के आधार पर, जिस पर प्रत्येक वर्ग का अधिकार था, मराठी बोलने वाले 9.6 के हकदार थे, गुजराती बोलने वाले लोग 3.3 और कन्नड़ बोलने वाले लोग 3.1 सीटों के हकदार थे। प्राप्त वास्तविक सीटों की संख्या के आधार पर पदाधिकारियों की नियुक्ति किस तरह हुई? कोटा चाहे जितना होता, मराठी बोलने वाले लोगों का कोटा 9.3, गुजराती बोलने वालों का 3.6 और कन्नड़ बोलने वालों का कोटा 3.1 था। वास्तव में देखा जाए तो पदाधिकारियों की नियुक्ति के आंकड़े क्या कहते हैं? 6 पद मराठी बोलने वाले लोगों को मिले, 6 गुजराती बोलने वाले लोगों को मिले और 4 कन्नड़ बोलने वालों को।

महोदय! जैसा कि मैंने कहा है कि मुझे मराठी होने का कोई गर्व नहीं है। लेकिन मैं हूं तो। और जब मैं इस शब्द का प्रयोग करता हूं, तो सदन को सचेत कर देना चाहता हूं कि मैं इसका उपयोग शिकायत के तौर पर नहीं कर रहा हूं। मेरा यह उद्देश्य नहीं है, इसका उल्लेख मैं केवल तथ्य को उजागर करने के लिए कर रहा हूं। तथ्य यह है कि अल्पसंख्यक गुजराती और कन्नड़ भाषियों के साथ सीटों या पदों की दृष्टि से कोई अन्याय नहीं किया गया है। सदन में इस विषय पर विचार होने से पहले मैंने अपने माननीय मित्र श्री जोग को स्पष्ट बता दिया था कि यदि वह मुझे यह बताएं और विश्वास दिला दें कि कन्नड़ भाषियों के साथ किसी भी रूप में, चाहे उन्हें सदन में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व मिला हो या उन्हें मंत्रिमंडल में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला हो, तो मैं सदैव उनका समर्थन करूंगा। लेकिन, महोदय! ये आंकड़े इकट्ठा करने में मैंने पूरा अध्ययन किया है और पूरी सावधानी बरती है। महोदय! ये आधिकारिक आंकड़े हैं। अपनी ओर से बोलते हुए मैं कह सकता हूं कि मेरे विचार में कन्नड़ भाषियों को इस प्रेसिडेंसी में रहने से कोई कष्ट नहीं हुआ है।

महोदय! अब दूसरे तर्क पर आते हैं। जो प्रश्न मुझे महत्त्वपूर्ण लगता है और जिसके बारे में न सिर्फ मैं इस तरफ से, बल्कि मेरे वे मित्र भी हैं जो इस प्रस्ताव के लिए उत्तरदायी हैं, उन्हें इस प्रश्न पर विचार करना ही पड़ेगा। यह वित्तीय प्रश्न है। क्या इस कन्नड़ भाषी प्रांत के लिए उतना खर्च उठा पाना संभव हो सकेगा, जो आधुनिक युग में प्रत्येक सभ्य राज्य सरकार के लिए व्यय का मानक माना जाता है? मेरे ख्याल से यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। दूसरी तरफ बैठे मेरे मित्रों ने जिन्होंने प्रस्ताव का समर्थन किया था, सदन का ध्यान एक शिकायत की ओर दिलाया है कि पहले इस प्रांत की सरकार के द्वारा कर्नाटक की काफी उपेक्षा की गई है।

माननीय अध्यक्ष : मैं सिर्फ समय-सीमा की ओर माननीय सदस्य का ध्यान दिलाना चाहता हूं।

* बोंबे लेजिस्लेटिव असेम्बली डिबेट्स, खंड 4, पृ. 1062-65, 10 सितंबर 1938