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पृथक कर्नाटक प्रांत का गठन

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है। हो सकता है, प्रांत का पृथक्करण कुछ लोगो की महत्त्वाकांक्षा को संतुष्टि दे, जो प्रांत के मुखिया की तरह गिने जाना चाहते हैं। लेकिन उस बाकी जनता का क्या होगा, जिसे भोजन की आवश्यकता है, जिसे कपड़ों की आवश्यकता है, जिसे मकानों की आवश्यकता है? हममें से कोई भी इस तरह की बात सहन नहीं कर सकता है। मैं जोर देकर यह बात कह रहा हूं। महोदय! आखिरकार ये जिले क्या हैं? इनमें से दो जिले तो अकाल-पीडि़त हैं! पूरा बीजापुर अकाल-पीडि़त जिला है। मुझे बताया गया है कि पूरा बेल्लारी भी अकाल-पीडि़त जिला है। अकाल-पीडि़त क्षेत्रों से कितना राजस्व प्राप्त करने की उम्मीद करते हैं? क्या मात्र बंबई प्रेसिडेंसी से पृथक करने से वह दुधारु गाय बन जाएगा?

मैं एक और प्रश्न का उल्लेख करना चाहता हूं, और वह यह है : अल्पसंख्यक वर्ग का होने के कारण मैं अल्पसंख्यकों के दृष्टिकोण से इन चीजों को देखता हूं। मुझे बहुत खुशी है कि जिन सदस्यों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया है, उन्होंने हमें यह आश्वासन दिया है कि मुसलमानों व हरिजनों के हितों की रक्षा की जाएगी। पर मैं यह कहना चाहता हूं कि इन प्रांतीय क्षेत्रों के विघटन के साथ अल्पसंख्यकों का विघटन भी हो जाएगा। मैं इस सच्चाई को नहीं भूल सकता कि कर्नाटक में हमारे पास केवल दो सीटें हैं। मुझे विश्वास है कि कर्नाटक से आए हुए अनुसूचित जाति के सदस्य अवश्य यह महसूस करेंगे कि उनकी शक्ति वास्तव में इस बात में निहित है कि प्रेसिडेंसी के अन्य क्षेत्रों से उनका ध्यान रखने वाले 13 सदस्य हैं। उनका क्या होगा? मुझे विश्वास है, उदाहरणतया, मुसलमान समुदाय को कर्नाटक से करीब आठ सीटें प्राप्त हुई हैं।

माननीय अली मोहम्मद खान देहलवी : केवल चार।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : बिलकुल ठीक। चूंकि मेरे पास समय कम है, इसलिए मैं बहस नहीं करूंगा। लेकिन हम इस तरह के विघटन की अनुमति नहीं देंगे। बहुसंख्यक समुदाय यह कह सकता है कि वे सहृदय और दयालु रहेंगे। हम उनकी सहृदयता व दयालुता पर निर्भर नहीं रह सकते। हमें अधिकार चाहिए और अधिकार सहृदयता के रूप में नहीं दिया जा सकता। ऐसा समुदाय जो सिर्फ जनसंख्या के आधार पर बनता है, वह केवल सूक्ष्म अल्पसंख्यक है। अगर मान लें कि वे अधि-प्रतिनिधित्व (वेटेज) देने को भी तैयार हैं तो ऐसी जनसंख्या को वे क्या अधि-प्रतिनिधित्व देंगे, जो कुछ लाख ही है? यह उन मुद्दों में से एक है, जिसके आधार पर मैं इस प्रस्ताव का विरोध करता हूं। मैं इस विघटन को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हूं। हमारी शक्ति बहुभाषी प्रशासन में निहित है। मैं कहना नहीं चाहता, पर मुझे भय है कि अगर कर्नाटक को पृथक प्रांत बना दिया जाता है, तो यह और लोगों की अपेक्षा लिंगायतों का ही प्रांत बन जाएगा। मैं मामले में कोई अस्पष्टता नहीं चाहता, पर अगर, उदाहरणतया, पृथक्करण होता है तो उससे कन्नड़वासियों के विरुद्ध मराठे