210 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
इकट्ठा हो जाएंगे। हम ऐसी बात नहीं चाहते — और साझा मोर्चेबंदी का जो हमें आज लाभ प्राप्त है, वह नहीं मिलेगा।
एक और पहलू की ओर मैं सदन का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं और उसके बाद अपना वक्तव्य समाप्त करना चाहूंगा। मैं जानता हूं कि ऐसे लोग हैं जो संभवतया मुझसे सहमत न हों। लेकिन मेरी यह धारणा है कि अंग्रेजों ने चाहे अतीत में जो कुछ भी किया हो, जो कुछ भी वह करने में असमर्थ रहे हों, ऐसी कई चीजें हैं जिन्हें करने में वे असमर्थ रहे हैं, जिनको शायद उनके स्वार्थ ने करने से रोका हो, लेकिन उन्होंने दो चीजें की हैं और उनको स्वीकार करने में मैं काफी उदार हूं तथा इस देश में उनके जाने के बाद भी उनकी यह दो बातें स्मारक के रूप में याद की जाएंगी। एक चीज जो उन्होंने हमारे लिए की है, वह है विधान संहिता। आप कश्मीर से लेकर दक्षिण भारत तक कहीं चले जाएं, तो पाएंगे कि कत्ल की सजा एक ही है, चाहे आप कश्मीर में करें या पंजाब या उत्तरी-पश्चिमी सीमा प्रांत में, या मद्रास में राजा मुंदरी में करें। आपको पता है कि संपत्ति के हस्तांतरण का अर्थ क्या होता है, गवाही का पूरे देश में क्या महत्त्व है। महोदय! मैं कहता हूं कि पहले हमारे यहां यह बात नहीं थी। अन्य चीज जो अंग्रेजों ने की है, वह यह है कि उन्होंने एक केन्द्रीय सरकार दी है। ऐसी चीज पहले हमारे यहां नहीं थी। केन्द्रीय सरकार होने की महत्ता के इस तथ्य के बारे में शायद हमने सोचा भी नहीं था। पर मुझे लगता है कि यह बहुत ही निर्णायक तथ्य है। अगर आज हम एक सर्वमान्य राष्ट्र, राष्ट्रीयता की भावना, एकता की भावना का निर्माण करने की राह पर चल रहे हैं, तो वह इस सच्चाई के कारण कि हम सभी के लिए एक सरकार है। इसका कारण यह है कि हम महसूस करते हैं कि हम एक ही सरकार के नागरिक हैं।
महोदय, मैं इस सदन के सदस्यों से प्रार्थना करूंगा कि वे ऐसा कुछ न करें जिससे इन दो लाभों को ठेस पहुंचे, जिन्हें हमने हासिल किया है। निजी तौर पर मैं खुल्लमखुल्ला कहना चाहता हूं कि मैं नहीं मानता कि इस देश में किसी विशेष संस्कृति के लिए कोई जगह है, चाहे वह हिन्दू संस्कृति हो, या मुस्लिम संस्कृति, या कन्नड़ संस्कृति, या गुजराती संस्कृति। ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें हम नकार नहीं सकते हैं, पर उनको वरदान नहीं मानना चाहिए, बल्कि अभिशाप की तरह मानना चाहिए, जो हमारी निष्ठा को डिगाती हैं और हमें अपने लक्ष्य से दूर ले जाती हैं। यह लक्ष्य है, एक ऐसी भावना को विकसित करना कि हम सब भारतीय हैं। मुझे अच्छा नहीं लगता, जैसा कि कुछ लोग कहते हैं, कि हम हिन्दू या मुसलमान पहले हैं और भारतीय बाद में। मैं इस बात से संतुष्ट नहीं हूं। मैं नहीं चाहता हूं कि भारतीय के रूप में हमारी निष्ठा किसी भी तरह की किसी प्रतियोगी निष्ठा से प्रभावित हो, चाहे वह हमारा धर्म हो, हमारी संस्कृति हो या हमारी भाषा हो। मैं चाहता हूं कि समस्त लोग पहले भारतीय हों, और अंततः भारतीय हों तथा भारतीय के सिवाए और कुछ