214 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
विधेयक के रद्द होने का कारण नहीं बनता।
मैं गुणावगुणों की बात नहीं कर रहा हूं। मैं केवल संवैधानिक पहलुओं की बात कर रहा हूं। प्रस्तावित नियम की शर्तें यह हैं कि हो सकता है कि विधेयक को कार्य-सूची में रखा गया हो और सदन का सत्र चल भी रहा हो, फिर भी जिस क्षण एक वर्ष पूर्ण हो जाएगा, वह सत्र के स्थगित हुए बिना अपने आप से रद्द हो जाएगा। इसलिए मेरे ख्याल से भारत सरकार अधिनियम की धारा 73, उप-खंड (2) संशोधन द्वारा प्रस्तावित नियम को बनाने में कोई बाधा नहीं है।
फिर दूसरी आपत्ति जो उठाई गई है, वह है . . .
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : महोदय! क्या मैं आपका ध्यान इस तथ्य की ओर दिला सकता हूं? मेरा निवेदन यह है कि अगर ‘केवल’ शब्द वहां है, तो जिस वाक्यांश का आपने सुझाव दिया है, वह उचित होगा।
महोदय! मैं प्रस्तावित संशोधन के संदर्भ में यह निवेदन करना चाहता हूं कि मुझे पता नहीं कि इस नियम 103 को बनाने की क्या आवश्यकता है। इसका अगर कोई विशेष कारण है, तो इसके बारे में मैंने नहीं सुना। यदि कोई विधेयक बिना विचार-विमर्श के भी कार्यवाही में रहता है, तो उससे क्या हानि होगी? अगर यह दर्शाया जाए कि सदन की पुस्तकों में बिना विचार-विमर्श किए विधेयक के रहने से कोई हानि या कोई असुविधा होती है तो मैं समझ सकता हूं कि नियम 103 में निहित प्रावधानों की आवश्यकता हो सकती है, पर मैंने ऐसा कुछ नहीं सुना कि क्या हानि या असुविधा हो सकती है और मेरा दूसरा निवेदन यह है कि जैसा कि इस नियम की संरचना की गई है, और संशोधन भी, सदस्य से विधेयक को बरकरार रखने का अधिकार छीन लेता है, चाहे उसकी कोई त्रुटि न हो। शब्द हैं — ‘अगर कोई प्रस्ताव नहीं किया गया।’ पर मेरा निवेदन यह है कि चूंकि विधेयक कार्यसूची में नहीं है या कि अन्य कारणों से इसे लिया नहीं गया, इसलिए सदस्य प्रस्ताव रख पाने की स्थिति में न हो, तो मेरे ख्याल से यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बात है, अगर किसी सदस्य को किसी विधान को प्रस्तावित करने से सिर्फ इसलिए वंचित कर दिया जाए, क्योंकि वह अन्य जरूरी कामों व अन्य कारणों से इस विधेयक के संदर्भ में प्रस्ताव नहीं रख सका। इसलिए जब तक कि और वैसे संशोधन न जोड़े जाएं जैसे ‘सचिव द्वारा मांग किए जाने पर भी’, मेरे ख्याल से इस नियम में ढेर सारी
खामियां हैं, और मैं इसलिए जिस रूप में संशोधन को प्रस्तावित किया गया है, उसका विरोध करता हूं।
माननीय श्री बी.जी. खेर : महोदय! परिस्थिति काफी जटिल है, क्योंकि जब नियम प्रस्तावित किया गया था या जब संशोधन पर समिति द्वारा विचार किया गया था, जिसमें वह भी शामिल है, जिसे वे अब अपनाना चाहते हैं। उस समय माननीय सदस्य यहां नहीं थे। इसलिए इससे पहले कि मैं इस आपत्ति का उत्तर दूं, यह