22. औद्योगिक विवाद विधेयक - Page 233

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औद्योगिक विवाद विधेयक *

डॉ. भीमराव अम्बेडकर (बंबई नगर) : अध्यक्ष महोदय! मैं इस विधेयक के प्रथम वाचन का विरोध करता हूं। मैं जिन विवशताओं के अधीन इसका विरोध करने का प्रयत्न कर रहा हूं, उनके प्रति मैं पूरी तरह सचेत हूं। मुझे खेद है कि जिन्होंने इस विधेयक पर मुझसे पहले विचार व्यक्त किए थे, उनके भाषण के समय मैं यहां उपस्थित नहीं था। यह एक ऐसा दुर्योग है, जिससे मैं दुर्भाग्यवश बच नहीं पाया। मैं किसी अन्य कार्यवश वहां न आ सका, और मैं अपने पूर्ववर्ती वक्ता द्वारा प्रस्तुत तर्कों को सुनने का लाभ न उठा सका। अपनी इस विवशता के बावजूद में कुछ कहने का प्रयत्न कर रहा हूं। मुझसे पहले बहुत से वक्ता बोल चुके हैं और बहस इतने लंबे समय तक चली है कि मैं हैरान हूं कि चर्चा के इन अंतिम क्षणों में क्या मेरे लिए कुछ कहने को शेष बचा भी है, लेकिन फिर भी मैं साहस कर रहा हूं, अगर मैं ऐसा कहूं कि इस तरह के 84 खंडों वाले इतने विस्तृत एवं वृहद विधेयक के संबंध में ऐसा कुछ हो सकता है, जिस पर जब कोई सदस्य चर्चा के अंतिम चरण में बोलने के लिए खड़ा हो, तो भी उसे कहने के लिए कुछ मिल जाए। मेरे विचार से मेरे माननीय मित्र श्री जमनादास मेहता ने विधेयक का विवरण बिल्कुल सही ढंग से प्रस्तुत किया है कि इस विधेयक का स्वरूप इतना व्यापक है कि यहां तक कि अगर शेषशायी को इसे लिखना पड़े तथा स्याही के रूप में अगर सागर और लिखने के लिए कागज के रूप में धरती भी उपलब्ध हो, तो भी शायद इस पूरे विधेयक को लिखने के लिए उन्हें ये सब पर्याप्त न लगें। इन सब सीमाओं को जानते हुए मैं संक्षेप में अपनी बात कहता हूं।

इस विधेयक को समझने के लिए मुझे लगता है कि इसके प्रावधानों को पूर्व अधिनियम के परिप्रेक्ष्य में पढ़ना आवश्यक है। मैं विश्वास करता हूं और सोचता हूं कि यह आसानी से मान लिया जाएगा कि इस विधेयक के प्रावधानों की महत्ता तब तक स्पष्ट नहीं होगी, जब तक कि हम पूर्व अधिनियम के प्रावधानों के साथ इसके प्रावधानों की तुलना नहीं करते। विधेयक का आखिरी खंड यह पूर्णतया स्पष्ट