औद्योगिक विवाद विधेयक
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करता है कि यह विधेयक 1934 के बंबई श्रम विवाद समझौता अधिनियम का स्थान लेने वाला है और इसलिए मुख्यतः विचारणीय प्रश्न यह है कि प्रधानमंत्री ने, जो इस विधेयक के प्रभारी हैं, इस विधेयक को प्रस्तुत करने से पूर्व क्या परिवर्तन के लिए कोई आधार तैयार किया है, जिसको 1934 का अधिनियम समझौते के लिए व्यवस्था प्रदान करने के आशय से बनाया गया था। 1934 के अधिनियम का सिद्धांत यह था कि समझौता स्वेच्छापूर्वक किया जाए। अब विधेयक में जो संशोधन प्रस्तुत किया गया है, वह यह है कि समझौता अनिवार्य होगा और मैं निवेदन करता हूं कि इस सदन के समक्ष जो विचारणीय प्रश्न है, वह यह है कि 1934 के अधिनियम के स्वैच्छिक प्रावधान को बदलने और उसे अनिवार्य स्वरूप देने के लिए क्या कोई आधार प्रस्तुत किया गया है।
अब वर्ष 1934 और तत्कालीन परिस्थितियों को एक ऐसे मानदंड के रूप में लेते हुए जिसके द्वारा अनिवार्यता प्रस्तावित करने की आवश्यकता को आंका जा सके, मैं उन कतिपय तथ्यों का उल्लेख करना चाहता हूं, जो प्रासंगिक तथा महत्त्वपूर्ण हैं। सदन का ध्यान जिस पहले तथ्य की ओर मैं दिलाना चाहता हूं, वह यह है कि 1934 में माननीय रॉबर्ट बेल द्वारा प्रस्तावित मूल विधेयक, जो बाद में अधिनियम बना, उसमें अनिवार्य समझौते के प्रावधान हैं। पर विधेयक को पुनः स्थापित करते समय इसकी आरंभिक अवस्था में इस विधेयक के प्रस्तावक समझते थे कि समझौते के मामले में 1934 में विद्यमान स्थितियों में अनिवार्यता की आवश्यकता नहीं थी और इसके परिणामस्वरूप उन्होंने अपनी इच्छा से आरंभ में ही विधेयक के प्रथम वाचन में अपने आरंभिक वक्तव्य में यह प्रस्तावना पेश की थी कि वह ‘सकेगा’ शब्द को ‘होगा’ शब्द में प्रतिस्थापित करने के लिए एक संशोधन प्रस्तुत करना चाहते हैं। मेरा निवेदन यह है कि यह इस तथ्य का प्रमाण है कि 1934 में समझौते के मामले में माननीय रॉबर्ट बेल को अनिवार्यता प्रस्तावित करने की कोई आवश्यकता महसूस नहीं हुई। जब विधेयक पुनः स्थापित किया गया था तो मेरे माननीय मित्र श्री सकलातवाला, जो बंबई के मिल मालिकों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, सदन में उपस्थित थे। उन्होंने भी 1934 में समझौते के मामले में अनिवार्यता की मांग नहीं की थी। दूसरी तरफ, विधेयक के प्रथम वाचन के दौरान उन्होंने जो वक्तव्य दिया था, उसमें वह विधेयक के समर्थन के प्रति निरुत्साहित थे क्योंकि उन्होंने यहां तक कहा कि विधेयक सामान्यतः अनावश्यक है। यह दृष्टिकोण उन्होंने अपनाया था और समझौते के संदर्भ में उन्होंने किसी भी प्रकार की अनिवार्यता के लिए निश्चित रूप से दबाव नहीं डाला या मांग नहीं की थी। वर्ष 1934 और वर्ष 1938 के बीच ऐसा क्या घटा था, जिससे इस सदन को समझौता वार्ता को वैकल्पिक न करके उसे अनिवार्यता में बदलना पड़ा।
अब, अनिवार्यता को उचित ठहराने के लिए प्रधानमंत्री देश में हड़तालों के कुछ निश्चित आंकड़े हमें देते हुए शुरू में यह जताने का प्रयास कर रहे हैं कि देश में