22. औद्योगिक विवाद विधेयक - Page 235

218 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

बार-बार हड़तालें होती रही हैं और वे इतनी गंभीर रहीं कि अब स्वैच्छिकता के प्रावधान को अनिवार्य प्रावधान में बदलने की आवश्यकता उठ खड़ी हुई है। अब मैंने हड़तालों के आंकड़ों की जांच कर ली है कि कितने मजदूर थे और कितने कार्य दिवसों का नुकसान हुआ। मुझे यह कहने में कोई हिचक महसूस नहीं होती कि हड़तालों से संबंधित आंकड़ों के आधार पर प्रधानमंत्री महोदय जो कहना चाहते हैं, उससे मैं संतुष्ट नहीं हुआ हूं। बंबई नगर में हुई हड़तालों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करते हुए, मेरे पास यहां श्रम कार्यालय द्वारा प्रकाशित लेबर गजट का मार्च अंक है। इस अंक के पृष्ठ 541 पर बंबई प्रेसिडेंसी में हुई हड़तालों के आंकड़े हैं। 1921 से 1937 तक, यह गजट स्तंभ एक में श्रम विवादों की संख्या देता है। दूसरे में सम्मिलित मजदूरों की संख्या देता है और तीसरे में कार्य दिवसों की हानि बताता है। इन आंकड़ों पर नजर दौड़ाते हुए मुझे विश्वास है कि कोई भी अपने आप यह देख लेगा कि साल दर साल औद्योगिक विवाद बढ़ने के बजाए घट रहे हैं। उदाहरणतया, वर्ष 1921 में बंबई में औद्योगिक विवाद 103 थे, 1922 में 143, 1923 में 109, और 1924 तथा 1927 के बीच वे 50 तक आ गए। आंकड़े पूरे 50 प्रतिशत तक घट गए और फिर 1928 में ये आंकड़े 144 तक पहुंच गए। 1929 से लेकर 1937 तक, यह 88 और 53 के बीच चलते रहे। मैं यह स्वीकार करता हूं कि ये जो हड़तालें हुईं, वे उद्योगों में हुई अव्यवस्था व गड़बड़ी को मापने का आधार नहीं हैं। इस सूची में दिए गए आंकड़ों से मुझे यह पता चलता है कि ऐसे कई मामले हैं, जिनमें यद्यपि हड़तालों की संख्या कम है, लेकिन उनमें शामिल लोगों की संख्या अपेक्षाकृत काफी ज्यादा है और नष्ट हुए कार्य-दिवसों की संख्या भी काफी है। लेकिन नष्ट हुए कार्य दिवसों की संख्या को आधार मानते हुए, जो कि एकमात्र आधार है, मुझे लगता है कि 1928 का वर्ष सबसे बुरा था, जिसके परिणामस्वरूप 24 करोड़ कार्य-दिवसों की हानि हुई और तीसरा वर्ष था 1929 का जब 8 करोड़ कार्य-दिवसों की हानि हुई। लेकिन वर्ष 1929 से आगे की स्थिति से पता चलता है कि तब कई कामगार हड़तालों में शामिल हुए और कई कार्य-दिवसों की हानि हुई तथा वर्ष 1934 के बाद कई हड़तालें हुईं। इसमें किसी ऐसी स्थिति के उत्पन्न होने की बात नहीं है, जो सरकार के किसी भी सदस्य को चिंता में डाल दे। एक मात्र वर्ष 1937 ही खराब रहा है, जब 897 कार्य-दिवसों की हानि हुई। पिछले वर्ष की तुलना में यह कुछ नहीं था। मुझे बताया गया है कि ऐसा अहमदाबाद शहर में एक आम हड़ताल होने के कारण हुआ, जो 15 दिनों तक चली। इसलिए मेरा पहला निवेदन यह है कि सरकार अथवा माननीय प्रधानमंत्री द्वारा ऐसा कोई आधार प्रस्तुत नहीं किया गया है जो किसी भी तरह, सदन के इस पक्ष को अथवा मुझे 1934 के अधिनियम के प्रावधानों में इस मूलभूत परिवर्तन के लिए राजी कर सके। समझौता-वार्ता की अनिवार्यता के विषय में इतना कहना ही काफी है।