औद्योगिक विवाद विधेयक
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सेवा-अनुबंध का उल्लंघन दीवानी का मामला है? कानून इस प्रश्न का उत्तर देता है : हां, यह दीवानी त्रुटि है। दीवानी त्रुटि को सहने वाले प्रभावित व्यक्ति के लिए समाधान क्या है? यह इसके बाद अगला प्रश्न होगा। फिर इसका उत्तर यह है कि वर्तमान कानून पीडि़त व्यक्ति के लिए जिसका अनुबंध एक मजदूर द्वारा तोड़ा गया है, दो समाधान प्रदान करता है और वे हैं — हरजाना तथा निश्चित सहायता। यद्यपि कानून ये दो समाधान प्रदान करता है, यानि हरजाना और निश्चित सहायता, लेकिन जहां कहीं भी दीवानी त्रुटि हो उसके लिए एक प्रावधान है, जो विशेषकर सेवा के अनुबंधों पर लागू होता है। जहां कहीं भी एक व्यक्ति नौकरी के अनुबंध को तोड़ता है, वहां प्रभावित व्यक्ति सिर्फ क्षतिपूर्ति का अधिकारी है, उसे इस स्थिति में कभी भी निश्चित सहायता प्राप्त नहीं हो सकती और अदालत कभी भी ऐसी सहायता नहीं देगी, जिससे वह किसी व्यक्ति को उसके द्वारा किए गए सेवा-अनुबंध को पूरा करने के लिए बाध्य कर सके। प्रभावित व्यक्ति केवल क्षतिपूर्ति का अधिकारी है। महोदय, जहां तक सेवा के अनुबंध के उल्लंघन का संबंध दीवानी संबंधी त्रुटि से है, उसकी यही स्थिति है। इस दीवानी अकर्मण्यता के लिए मालिक हरजाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं पा सकता।
सेवा के अनुबंध के उल्लंधन को कानूनी अपराध के रूप में देखते हुए प्रश्न यह है कि क्या यह अपराध है? जहां तक सेवा के अनुबंध के उल्लंघन का सवाल है, भारतीय कानून में इस संबंध में क्या प्रावधान है? महोदय! यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि सदन को थोड़ी बहुत इस बात की जानकारी दे सकूं कि हमारे भारतीय कानून द्वारा इस मामले को कैसे समझा जाता है? सेवा के अनुबंध के उल्लंघन से संबंधित भारतीय कानून 1859 का अधिनियम 13 था और इसे कामगार अनुबंध अधिनियम का उल्लंघन कहा गया है। यह 1859 में सैनिक विद्रोह के तुरंत बाद या उसके दौरान पारित हुआ। मैं अभी इस सदन के समक्ष इस कानून को पारित करने के कारण प्रस्तुत करूंगा। फिर, भारतीय दंड संहिता, जो इस मामले से संबद्ध है, में भी प्रावधान हैं अर्थात् उसमें सेवा के अनुबंध का उल्लंघन अपराध माना गया है और इससे संबंधित धाराएं हैं — 490, 491 और 492। 1859 के अधिनियम 13 के संदर्भ में यह अधिनियम सीमित रूप से लागू होता था। यह कारीगरों व शिल्पकारों पर उन मामलों में लागू होता था, जहां कारीगरों व शिल्पकारों ने अपने मालिकों से अग्रिम धन ले रखा था और बाद में काम करने से मना कर दिया था। परिस्थितियों की आवश्यकता के कारण यह आदेश दिया गया था। ब्रिटिश सरकार को विद्रोह का सामना करना पड़ा। विद्रोह के दौरान फौज ने अनेक कारीगरों व शिल्पकारों की नियुक्ति की, जिनको इस उम्मीद से अग्रिम धन दिया गया कि जिन कार्यों का उन्होंने बीड़ा उठाया है उनका वे निष्पादन करेंगे, परंतु डर अथवा अन्य परिस्थितियों के कारण वे कारीगर और शिल्पकार अपने गांवों में वापस चले गए। परिणामस्वरूप,