22. औद्योगिक विवाद विधेयक - Page 239

222 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

वे उस कार्य को करने की स्थिति में नहीं थे, जिसका उन्होंने बीड़ा उठाया था, जबकि उन्हें अग्रिम धन मिला था। ऐसे मामलों को लेने के लिए ही 1859 का अधिनियम पारित किया गया। यह बात रिकॉर्ड में है कि यद्यपि यह अधिनियम पारित किया गया था और इसके अनुसार सेवा के अनुबंध के उल्लंघन को एक अपराध माना गया था, तथापि यह कदाचित ही लागू किया गया। यह वास्तव में कोई कानून नहीं था, जिसके अंतर्गत लोगों को कष्ट उठाने पड़े थे। महोदय! इस अधिनियम का बाद का इतिहास भी बहुत रोचक है। यह अधिनियम 1859 से एक विधिवत संविधि की तरह कायम रहा, लेकिन जैसा कि मैंने कहा, इसे कभी कार्यान्वित नहीं किया गया। इसका संशोधन भारत सरकार के 1920 के अधिनियम 12 द्वारा किया गया। संशोधी अधिनियम ने इस अधिनियम में दो बड़े हितकारी सिद्धांत प्रस्तुत किए। इस अधिनियम में प्रस्तुत किया गया एक हितकारी सिद्धांत यह था कि किसी मजिस्ट्रेट को नौकरी के अनुबंध का उल्लंघन करने वाले किसी शिल्पकार को दंडित करने से पहले अनुबंध की न्यायिकता की जांच करने का अधिकार होगा, ताकि इस तथ्य के बावजूद कि उस मजदूर ने मालिक से अग्रिम धन लिया था, मजिस्ट्रेट के इस निष्कर्ष पर पहुंचने पर कि अनुबंध न्याय विरुद्ध है, उसे उस उद्दंड मजदूर को दंडित करने का अधिकार नहीं होगा। 1920 के अधिनियम द्वारा प्रस्तुत दूसरा हितकारी प्रावधान यह था कि मजिस्ट्रेट को उस मालिक को सजा देने का अधिकार मिला था, जो निरर्थक शिकायत लाया हो — यह प्रावधान मूल अधिनियम में नहीं था।

भारतीय दंड संहिता की धाराओं के संबंध में जिन तीन धाराओं का मैंने उल्लेख किया है, उनका रोचक इतिहास है। धारा 490 किसी समुद्री यात्रा के दौरान नौकरी के अनुबंध के उल्लंघन से संबंधित थी। यह बहुत ही सीमित उपयोग की धारा थी, जो नौकरी के अनुबंध के सभी उल्लंघनों पर लागू नहीं होती थी। यह केवल उन नाविकों पर लागू होती थी, जो समुद्री यात्रा पर गए हों। वास्तव में नाविकों की सेवा के मामले में इस तरह का अपवाद आवश्यक था, चूंकि यात्रा की सफलता व सुरक्षा उनकी अविच्छिन्न सेवा पर निर्भर होती थी। अन्य धारा 491, परिचारक की ओर से असहाय लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति करने में अनुबंध के उल्लंघन से संबंधित थी। उदाहरणतया, यह उस आया पर लागू होती थी, जिसने एक असहाय बच्चे की देखभाल करने का अनुबंध किया हो। यह उस नौकर पर लागू होती थी, जिसने एक ऐसे अपंग व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व उठाया है, जो अपनी देखभाल स्वयं नहीं कर सकता। धारा 491 यही थी। धारा 492 में ऐसी सेवा के अनुबंध के उल्लंघन का मामला आता है, जो दूर स्थान पर हो और वहां नौकर को मालिक के खर्चे पर भेजा गया हो।

ये तीन प्रावधान थे, जो भारतीय दंड संहिता होने पर जारी अधिनियम बनाए गए थे। महोदय! जब से ये अधिनियम बने हैं, तब से इन तीनों धाराओं का क्या