औद्योगिक विवाद विधेयक
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इतिहास रहा है? इतिहास यह है कि 1925 के अधिनियम 3 के द्वारा केन्द्रीय विधान मंडल ने धारा 490 और धारा 492 को रद्द किया। ये धाराएं अब लागू नहीं होती हैं और उनके अंतर्गत सेवा की शर्तों का उल्लंघन, जो कि अपराध था, अब बिल्कुल भी अपराध नहीं है। इसलिए अब जो धारा बचती है वह है — भारतीय दंड संहिता की धारा 491। इसलिए भारत में केवल नौकरी के अनुबंध के उल्लंघन के संबंध में लागू कानून जो क्षतिपूर्ति से भिन्न है और जिसमें दंड के परिणाम शामिल हैं — धारा 491 ही है। मुझे नहीं लगता कि सदन का कोई भी सदस्य यह जान लेने पर भी इस प्रावधान की नुक्ताचीनी करेगा कि इसका उद्देश्य ऐसे व्यक्ति का मामला उठाने से है जो असहाय है और अपनी सुरक्षा स्वयं नहीं कर सकता।
महोदय! सेवा के अनुबंध के उल्लंघन के परिणामस्वरूप उत्पन्न वैधानिक स्थिति के संबंध में मैंने अब तक जो कुछ कहा है, उसकी समीक्षा के रूप में अब यह कहूंगा कि यह वर्जित शब्द ‘हड़ताल’ का लोकप्रिय वर्णन मात्र है। स्थिति क्या है? स्थिति यह है कि सेवा के अनुबंध का उल्लंघन कोई अपराध नहीं है और यह भारतीय कानून के अंतर्गत तब तक दंडनीय नहीं है, जब तक कि मामला धारा 491 के अंतर्गत न आए। इसका अर्थ है कि यह केवल दीवानी किस्म का मामला है, यह अपराध नहीं है और इसके अतिरिक्त, यह इस दीवानी मामले का समाधान केवल हरजाना हो सकता है, न कि विशिष्ट निष्पादन। मुझे विश्वास है कि जिस प्रश्न पर मैं जोर देना चाहता हूं, सदन उस पर गंभीरतापूर्वक विचार करेगा। प्रश्न यह है कि भारतीय कानून सेवा के अनुबंध के उल्लंघन को अपराध क्यों नहीं मानता है? और भारतीय कानून विशिष्ट निष्पादन के लिए व्यवस्था क्यों नहीं करता है। सदन के अन्य सदस्य जो भी कुछ उत्तर देना पसंद करें, लेकिन मेरा उत्तर तो बड़ा सरल है और वह यह है कि भारतीय विधान-मंडल सेवा के अनुबंध के उल्लंघन को इसलिए अपराध नहीं मानता क्योंकि वह सोचता है कि इसको अपराध मानने का अर्थ है, किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध कार्य करने के लिए बाध्य करना, और उसको दास बनाना। इसलिए मेरा दावा है कि हड़ताल पर जुर्माना लगाना एक मजदूर को दास बनाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। दासता क्या है? संयुक्त राज्य के संविधान में इसे इस तरह परिभाषित किया गया है कि दासता और कुछ नहीं बल्कि बरबस पराधीनता है। यह नैतिकता के विरुद्ध है, यह विधि शास्त्र के विरुद्ध है। महोदय! भारतीय दंड संहिता को बनाने वालों ने उस बात पर ध्यान दिया होगा, जिनका मैंने अभी उल्लेख किया है। जब उन्होंने इन प्रावधानों का प्रारूप तैयार किया होगा, यानि धारा 490, 491 और 492, जैसा कि मैं मुख्य विवरण से यहां समझ रहा हूं, तब निस्संदेह उन्हें संशय हुआ होगा और वे सोचते रहे होंगे कि क्या वे धारा 490, 491 और 492 में सम्मिलित छोटे से प्रावधानों को लागू करने में सही होंगे। यही बात भारतीय दंड संहिता बनाने वालों ने अध्याय 19 के लिए कही है जिसका शीर्षक है — ‘सेवा-अनुबंध का उल्लंघन’ :