228 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
होता। अगर आपको लगे, आप हड़ताल कर सकते हैं, तो ऐसा दो महीने में करना होगा। अगर आप नहीं करते और दो महीने बाद अन्य कोई शिकायत लेकर आते हैं, तो आपको फिर से चार महीने 25 दिनों तक इंतजार करना होगा। महोदय! मैं यह जानना चाहता हूं कि निष्क्रियता की यह अंतहीन प्रक्रिया क्या पूर्ण दासता को जन्म नहीं देगी, जो मजदूरों के लिए हमेशा के वास्ते चिरस्थायी दासता है। अगर यह मजदूरों में दासता लाने का विधेयक नहीं है, तो मैं जानना चाहता हूं कि फिर किस तरह का विधेयक दासता को प्रस्तावित करेगा। हड़ताल से संबंधित विधेयक के प्रावधानों के संदर्भ में यह बहुत बड़ी बात है।
महोदय! मैं हिदायत देते हुए कहता हूं कि श्रमिक विवाद के इस विधेयक के प्रावधानों की तुलना 1929 के श्रमिक विवाद अधिनियम से की जाए, जो हड़ताल से संबंधित है। यह भी ऐसा अधिनियम है, जो हड़ताल करने के अधिकार को सीमित करता है। इसलिए उस अधिनियम में निहित प्रावधानों की तुलना इस विधेयक में निहित प्रावधानों से करना बेहतर होगा, ताकि सदन इस बात को समझने की स्थिति में हो कि हम किस दिशा में जा रहे हैं, क्या हम दासता की ओर बढ़ रहे हैं? महोदय! 1929 का अधिनियम मजदूरों के हड़ताल करने के अधिकार पर कुछ सीमाएं लगाता है और उसकी दो धाराओं का अगर मैं उल्लेख करूं तो वह काफी होगा। राजनैतिक उद्देश्यों से प्रेरित 1929 का अधिनियम सामान्य हड़ताल को दंडनीय बनाता है। यह इस अधिनियम की धारा 16 है और अन्य धारा, जो मेरे उद्देश्य के लिए प्रासंगिक है, वह धारा 15 है, जो बिना नोटिस के हड़ताल को दंडनीय बनाती है। ऊपरी तौर पर, अधिनियम 1929 और वर्तमान विधेयक में कुछ समानता लगती है, क्योंकि कुछ हद तक यह विधेयक भी बिना नोटिस की हड़ताल को दंडनीय ठहराता है। परंतु, महोदय! इसके विपरीत एक विधेयक दूसरे से उसी तरह भिन्न है, जैसे कि चूना दही से। एक का दूसरे से कोई मतलब नहीं है और तुलनात्मक रूप से मुझे यह कहने में बिल्कुल भी हिचकिचाहट नहीं है कि यह विधेयक प्रतिक्रियात्मक और प्रतिगामी है और यह कि इस विधेयक को लिखने वाले, 1929 के अधिनियम को लिखने वाले से कहीं ज्यादा अनुदार हैं।
महोदय! हम 1929 के अधिनियम के खंड 15 के प्रावधानों की तुलना करते हैं। जैसा कि प्रत्येक व्यक्ति जो इस विषय से वाकिफ है, यह जानता है कि 1929 के अधिनियम का खंड 15 जनोपयोग तक सीमित है। यह अधिनियम समस्त हड़तालों को दंडनीय घोषित नहीं करता है, बल्कि उन हड़तालों को इंगित करता है, जिन्हें जनोपयोगी सेवा कहा जाता है। मैं यही निवेदन कर रहा हूं कि 1929 के अधिनियम और इस विधेयक के बीच मौलिक भेद हैं। महोदय! मैं यह प्रश्न पूछना चाहता हूं कि 1929 में उठाए गए कदम का परित्याग क्या किसी तरह न्यायसंगत है? और मेरे
ख्याल से यह अभीष्ट होगा अगर मैं यह कहकर शुरू करूं कि केन्द्रीय सभा के समक्ष,