22. औद्योगिक विवाद विधेयक - Page 246

औद्योगिक विवाद विधेयक

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जब 1929 में यह विधेयक पेश किया गया था तब कांग्रेस पार्टी की क्या स्थिति थी। महोदय! मैंने प्रवर समिति की रिपोर्ट ढूंढ निकालने और पढ़ने की तकलीफ उठाई है, जो केन्द्रीय विधायक द्वारा विधेयक के प्रावधानों पर विचार करने के लिए नियुक्त की गई थी और बाद में 1929 का अधिनियम बन गया था। मैं दो बातों पर अपना ध्यान सीमित रखते हुए नौकरशाही शब्द का प्रयोग कर रहा हूं, जिससे दूसरा पक्ष परिचित है। एक तरफ नौकरशाही और दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी है। जब 1929 का यह अधिनियम बन रहा था, तब वहां विवाद के क्या मुद्दे थे? मुझे लगता है कि मतभेद के मुद्दे ये थे — सरकार चाहती थी कि जनोपयोगी सेवाओ को परिभाषित करना, उसके विवेक पर छोड़ दिया जाए। वे अधिनियम में जनोपयोगिता की परिभाषा नहीं देना चाहते थे और न उस समय वे उसका विवरण देने को तैयार थे, जो उनके विचार से जनोपयोगी सेवाएं थीं। उन्होंने कहा कि जनोपयोगिता और उसकी महत्ता, मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करती है। वह समय तथा परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। एक कार्य जो एक अवसर पर हो सकता है कि जनोपयोगी सेवा न हो, लेकिन किसी अन्य अवसर पर जनोपयोगी हो सकता है और उन्हें लगा कि समाज के हित में, जैसा कि उन्होंने सोचा था, यह आवश्यक था कि स्थिति को परिभाषित करके परिवर्तन के साथ सरकार के निर्णय पर परिभाषित करने के लिए छोड़ दिया जाए। अब इस समय कांग्रेस दो बातें चाहती है — पहली बात वह यह चाहती है कि नौकरशाही के निर्णय पर कुछ भी न छोड़ा जाए, ताकि वह नौकरशाही उद्देश्यों के लिए स्वीकारा न जा सके। इसलिए कांग्रेस दल ने यह दृष्टिकोण अपनाया कि कोई भी निर्णय सरकार पर छोड़ने की आवश्यकता नहीं है।

खंड 15 की सीमा में जो भी जनोपयोगिता लानी है, उसे अधिनियम में स्पष्ट रूप से उद्धृत करना होगा। जब विधेयक पर चर्चा छिड़ी तब कांग्रेस दल ने 1929 में दूसरी स्थिति यह अपनाई थी कि जनोपयोगिता की कोटि बहुत विस्तृत थी और हड़ताल को सिर्फ इसलिए अवैध नहीं माना जाए क्योंकि वह जनोपयोगी सेवा से संबंधित है। उन्होंने जो स्थिति अपनाई वह यह थी कि उसे केवल ‘सामाजिक सुरक्षा सेवाओं’ तक सीमित कर दिया जाए। 1929 में यही स्थिति थी। इस विवाद में सरकार ने एक मुद्दा छोड़ दिया। उन्होंने माना कि जनोपयोग को अधिनियम में अवश्य ही परिभाषित किया जाना चाहिए और इसलिए, महोदय! आप देखेंगे कि अधिनियम का खंड 2, जो कि एक व्याख्यात्मक खंड है, मैं जनोपयोगिता की परिभाषा है और उधर आपके पास जनोपयोगिता की सूची है, सरकार का उसमें और कुछ जोड़ने का या उसमें से कुछ निकाल लेने का कोई निर्णय नहीं है। अन्य स्थिति के संदर्भ में, अर्थात् जिसमें सेवा की श्रेणी को सीमित करने के साथ ही हड़ताल की अवैधता को भी सीमित करना था, सरकार ने प्रयत्न नहीं किया। सरकार ने कहा कि उसका यह फार्मूला था कि जनोपयोगी सेवा तक उसे विस्तृत करके कायम रखा जाए, परंतु कांग्रेस पार्टी इसमें सफल न हो सकी। लेकिन मेरी बहस पर इससे कोई फर्क नहीं