230 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
पड़ता क्योंकि मेरा तर्क यह है कि 1929 में कांग्रेस पार्टी सामाजिक सुरक्षा सेवाओं के मामले में ही हड़ताल की अवैधता को सीमित करने के लिए दृढ़ रही। महोदय! मैं प्रवर समिति की रिपोर्ट से कुछ नोट पढ़ना चाहता हूं जिन्हें कांग्रेस के सदस्यों ने लिखा था। मुझे विश्वास है कि माननीय सदस्य श्री जमनादास मेहता उस समय कांग्रेस के सदस्य थे, पर यह मैं पक्के तौर पर नहीं कहता।
श्री जमनादास एम. मेहता : मैंने आज तक इस दृष्टिकोण को बनाए रखा है।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : महोदय! यह श्री जमनादास मेहता, श्री एम.एम. शेष आयंगर, श्री एस.एस.सी. मित्र और श्री वी.वी.पी. जोगिया द्वारा लिखित नोट्स में से है :
विधेयक की मूल आपत्तियां जो प्रवर समिति ने प्रकट की हैं, प्रभावहीन रही हैं।
हम समझते हैं कि ख्ांड 15 और उसके आगे के प्रावधान औद्योगिक विवादों को
सुलझाने में समर्थ नहीं हैं और ये उनमें केवल वृद्धि करेंगे तथा मालिकों और
मजदूरों के बीच संबंधों को कटु बनाएंगे जैसा कि ऐसे कानूनों के समस्त अनुभव
प्रमाणित करते हैं कि उस राजनैतिक प्रचार को दबाने के लिए प्राधिकारियों
का इस्तेमाल किया जाएगा, जो उसके विरुद्ध किया जाता है। अगर विधेयक
का उद्देश्य देश में समुचित मजदूर आंदोलन का विकास व पोषण करना है, तो
खंड 15 और उससे आगे के प्रावधान निश्चय ही उस उद्देश्य को पलीता लगा
देंगे।
उन्होंने यह कदम उठाया था कि जनोपयोगी सेवाओं पर लागू होने पर भी किसी भी हड़ताल को दंडनीय नहीं किया जा सकता। विरोध का नोट आगे कहता है :
. . .लेकिन इस उद्देश्य में असफल होने से हम विमत के इस नोट को संलग्न
करने के आभारी हैं। विधेयक की धारा 14 तक अदालत की जांच और समझौता
समितियों द्वारा औद्योगिक विवादों को सुलझाने का ठीक प्रयास है। हम
मानते हैं कि जहां तक विधेयक के उस हिस्से का संबंध है, वह प्रवर समिति
से निश्चित सुधरा हुआ व संगठित होकर निकला है। उस खंड तक विधेयक
में जितने भी परिवर्तन हुए हैं, वे उसे ज्यादा निष्पक्ष और न्यायसंगत बनाने में
सहायक हैं। निस्संदेह हम खंड 2 (छ) में ‘जनोपयोगी सेवाओं’ की परिभाषा
को गणना में नहीं लेते हैं। वह परिभाषा खंड 15 की अनुवर्ती है और इसलिए
इसे उसके साथ माना जाना चाहिए। हमें विश्वास है कि यह खंड मालिक व
कर्मचारी के दोस्ताना संबंधों के लिए बड़ा खतरा है। लोक सेवा ‘जनोपयोगी
सेवा’ हो सकती है, पर इसलिए वह यह नहीं माना जाएगा कि ऐसी सेवाओं
में बिना नोटिस के हड़ताल का फौजदारी अभियोग समझा जाए। यह सच है
कि इन सेवाओं में तालाबंदी को एक अपराध भी माना जाता है, लेकिन उससे
हड़ताल को दंडनीय अपराध बनाने के तर्क पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। हमें
समझ में नहीं आता कि डाक तार या टेलीफोन विभाग या रेलवे की सेवा में