234 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : सामूहिक सौदेबाजी को नियमित करते हुए, मैं बिल्कुल स्पष्ट बात करूंगा। इन नियंत्रणों का क्या फायदा है? दीवानी प्रक्रिया संहिता में अनेक अधिनियम हैं। क्या वादी उनमें रुचि रखता है? वादी अपने मुकदमें के परिणाम के प्रति ज्यादा दिलचस्पी रखता है। इन समस्त औपचारिकताओं, प्रावधानों व प्रक्रियाओं के होते हुए किसे नोटिस देना है, नोटिस देने के बाद क्या होगा, किसको लिखित वक्तव्य व अन्य चीजों का प्रारूप तैयार करना होगा — भूखे मजदूर को उसमें जरा भी रुचि नहीं है।
माननीय श्री के.एम. मुंशी : इसलिए दीवानी प्रक्रिया संहिता को रद्द कर दिया जाए।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : मैं ऐसा कुछ नहीं कहता। मैं यह कह रहा हूं कि जितने भी प्रावधान उनके पास हैं, उनका समर्थन इन्हें कर देना चाहिए था, अगर उनके पास साहस होता और उन्होंने यह कहा होता ‘हम अनिवार्य रूप से मध्यस्थ द्वारा उन्हें सुलझाएंगे, चाहे कोई सहमत हो या न हो।’ (व्यवधान) मैं सहमत होता हूं या नहीं यह अन्य मामला है। अगर आपने ऐसा दृष्टिकोण अपनाया होता, तो मैं निश्चित रूप से उसे समझ जाता, क्योंकि तब स्थिति यह होती कि चार महीने व 25 दिनों की समाप्ति के पश्चात् आप कुछ ठोस परिणामों के प्रति सुनिश्चित होते।
एक माननीय सदस्य : यह दैनिक मजदूरों के लिए दासता होती।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : आप इस विधेयक पर काफी कह चुके हैं और इस संबंध में आगे कुछ और कहकर आपको लज्जित होने की जरूरत नहीं (व्यवधान)।
माननीय अध्यक्ष : शांत, शांत।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : महोदय! यह सब किसलिए है? दोनों पक्षों के सहमत होने पर आपको अनेक अवस्थाओं — रजिस्ट्रार, मध्यस्थ, और मध्यस्थों की समिति से गुजरना पड़ता है। यह एक ऐसा मामला है कि किसी सदाशय वाले महानुभाव के पास जाया जाए जो विभिन्न लोगों से मधुर वार्तालाप करे और ऐसा अच्छा वातावरण तैयार कर दे, जो गुड़ बेशक न दे गुड़ जैसी बातें करे, मुझे इसमें कोई तुक नजर नहीं आती। मेरे विचार में यह व्यर्थ है, नितांत अकारथ — जिसका कोई ठोस परिणाम न निकलता हो। एकमात्र ठोस परिणाम यह होगा कि यह चार महीने 25 दिनों की टरकाऊ खींचतान मजदूर को आखिरकार हड़ताल करने में असमर्थ कर देगी। फिर से, मैं इस सदन का ध्यान उस विसंगति की ओर दिलाना चाहता हूं, जो 1934 के बंबई अधिनियम और वर्तमान विधेयक के बीच है। महोदय! जब 1934 का विधेयक तैयार हो रहा था, तब यह सुझाव दिया गया कि समझौते की अवधि के दौरान हड़ताल पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। इसे अमल में लाने का प्रस्ताव था। लेकिन माननीय रॉबर्ट बेल ने इस प्रस्ताव को रद्द कर दिया। उन पर यह भी दबाव डाला गया कि अगर हड़ताल को प्रतिबंधित नहीं किया जाता तो कम से कम धरना देने