औद्योगिक विवाद विधेयक
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मैं नहीं जानता कि क्या यह कुछ ऐसा मामला है, जिस पर किसी को भी शर्म आ जाए। विधेयक के दो भागों के बीच कोई व्यावहारिक संबंध था, या नहीं था; अगर था तो उसे प्रकट किया जाना चाहिए था और अगर कोई मूलभूत संबंध नहीं था, तब तार्किक निष्कर्ष यह है कि इन धाराओं को विधेयक से हटा देना चाहिए। लेकिन महोदय! यह मेरी मेहनत का फल निकला है कि उन दोनों के बीच मूलभूत संबंध है। वह मूलभूत संबंध क्या है, उसे विधेयक के खंड 75 का उल्लेख करके आसानी से देखा जा सकता है। विधेयक के खंड 75 के अनुसार :
इस अधिनियम के तहत किसी भी प्रक्रिया में किसी कर्मचारी को उसके प्रतिनिधियों के अलावा उपस्थित होने का अधिकार नहीं होगा।
महोदय! यह एक बुनियादी धारा है और मैं कहता हूं कि यह भारत में समस्त मजदूर संघवाद की सबसे विनाशकारी धारा है। कर्मचारियों का यह प्रतिनिधि कौन है, जो समझौते की प्रक्रियाओं में मजदूरों का प्रतिनिधित्व करने का अधिकारी है? औद्योगिक विवादों के समाधान के लिए किसी भी प्रकार की संधि-वार्ता में शामिल होने का अधिकार किसी भी व्यक्ति को नहीं है, चाहे उसकी योग्यताएं कुछ भी हों।
इससे तब तक कोई फर्क नहीं पड़ता, जब तक कि वह उस परिभाषा के अंतर्गत नहीं आता, जिसे इस विधेयक के द्वारा कर्मचारियों का प्रतिनिधि कहा गया है और यह परिभाषित करने के उद्देश्य से कि मजदूरों का प्रतिनिधि कौन है, मेरे माननीय मित्र ने विधेयक के खंड 4 से लेकर 20 तक प्रस्तावित किए हैं। वे सब इस खंड पर आधारित हैं। इसलिए महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इस विधेयक के अंतर्गत कर्मचारियों का प्रतिनिधि कौन है?
महोदय! इस विधेयक के तहत संघों की वे दो श्रेणियों आती हैं, जिनके पास मजदूरों का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार है। पहला संघ वह है, जिसके पास सदस्यों के रूप में मजदूरों का 20 प्रतिशत है या सदस्यों के रूप में मजदूर 20 प्रतिशत से कम नहीं हैं और उसे मालिक से मान्यता प्राप्त है। दूसरा संघ वह है, जिसकी सदस्यता 50 प्रतिशत से अधिक है और वह समझौते की प्रक्रियाओं में मजदूरों का प्रतिनिधित्व कर सकता है। संघों की दो श्रेणियां ये ही हैं, जिनके पास मजदूरों का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार है। महोदय! अब मेरे माननीय मित्र, मंत्री जी, इन दोनों को ही प्रतिनिधि संघ कहना पसंद करते हैं। मैं इस परिभाषा से असहमत हूं। मेरे ख्याल से खरी बात कहनी चाहिए। खरी बात कहते हुए मेरा निवेदन है कि इस विधेयक में निस्संदेह दो तरह के प्रतिनिधि संघ हैं, लेकिन ध्यान देने योग्य महत्त्वपूर्ण बात यह है कि एक बंधक संघ है और दूसरा मुक्त संघ। महोदय! मेरे इस कथन में न तो कोई अतिशयोक्ति है, न ही भाषा को तोड़ा-मोड़ा गया है कि एक संघ जिसके पास अधिकार है, वैधानिक अस्तित्व है, प्रतिनिधित्व करने एवं बोलने का अधिकार है लेकिन फिर भी जैसे मालिक की पूर्व स्वीकृति लेनी पड़ती है तो वह बंधक संघ है,