औद्योगिक विवाद विधेयक
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प्रतिनिधियों के रूप में भेजने में समर्थ है तो इस विधेयक के अंतर्गत पंजीकरण करने की क्या आवश्यकता है? मैं इस प्रश्न का उत्तर बाद में चाहूंगा। विधेयक जो करता है, वह बहुत ही विचित्र बात है, जिसको मैं समझ नहीं पाया हूं। 1926 के अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत संघ, सदन के तहत स्थिति की विसंगति को महसूस नहीं कर सकता। 1926 के अधिनियम के तहत पंजीकृत संघ विधान-मंडल में मजदूरों का प्रतिनिधित्व करने में काफी सक्षम है, वह विधेयक के तहत समझौता अधिकारी के समक्ष मजदूरों का प्रतिनिधित्व करने में सक्षम क्यों नहीं है? फिर यह विसंगति क्यों है? विधेयक मात्र विसंगति ही पैदा नहीं करता, बल्कि वह 1926 के अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत संघों के विशेषाधिकारों का हनन भी करता है।
इस संदर्भ में मैं सदन का ध्यान 1934 के बंबई अधिनियम के प्रावधानों की ओर दिलाना चाहता हूं कि उसके अंतर्गत क्या होता था। जब समझौते की प्रक्रियाएं शुरू हुईं, वे सदस्य जो इस अधिनियम के प्रावधान जानते हैं, जिन्हें याद होगा कि धारा 9 के तहत मजदूरों का प्रतिनिधित्व नुमाइंदों द्वारा होता था। इस अधिनियम का यही प्रावधान था। धारा 9 के ये शब्द हैं :
धारा 8 के तहत, नोटिस मिलने पर, औद्योगिक विवादों में भाग लेने वाले, नोटिस
में दिए समय के अंदर या इस ओर से समझौता अधिकारी द्वारा तय किए गए
समय में, प्रतिनिधियों को इस ढंग से नियुक्त कर सकते हैं, जैसा कि समझौता
अधिकारी निर्देश दे।
इसलिए 1934 के अधिनियम के अंतर्गत समझौते की प्रक्रिया में प्रतिनिधियों द्वारा मजदूरों का प्रतिनिधित्व किया गया। इन प्रतिनिधियों का चुनाव कैसे हुआ? 1934 के अधिनियम के तहत समझौता अधिकारी के समक्ष मजदूर का प्रतिनिधित्व करने वाले इन प्रतिनिधियों का चयन करने के अधिकारी कौन थे? महोदय! मैंने इस अधिनियम में बनाए गए नियमों को पढ़ा है और नियमों का उल्लेख यह प्रमाणित करेगा कि जो पक्ष प्रतिनिधियों का चुनाव करने के अधिकारी थे, वे ही पंजीकृत श्रमिक संघ थे, जो 1926 के औद्योगिक विवाद अधिनिमय के तहत पंजीकृत किए गए थे। यह 1934 के बंबई अधिनियम के अंतर्गत नियमों के नियम संख्या 3 में प्रस्तावित है। इसलिए यह स्पष्टतया प्रमाणित हो जाता है कि इस क्षण तक जो संघ केंद्रीय विधान-मंडल के 1926 के अधिनियम के तहत पंजीकृत था, उसे इस तथ्य के कारण कि पहले वह निगम था, सभी स्थानों और सभी संयोजनों पर मजदूरों का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार है। संवैधानिक रूप से, 1935 के भारत सरकार के अधिनियम के द्वारा उन्हें विधान-मंडल में मजदूरों का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार दिया गया है, और 1934 का बंबई अधिनियम, स्पष्ट तौर पर यह मानता है कि उस अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत श्रमिक संघ, यानी 1934 का बंबई अधिनियम समझौता अधिकारी के सामने प्रतिनिधि भेजने का एकमात्र अधिकारी निकाय है। महोदय! मेरी पहली शिकायत यह है कि यह विधेयक एक मूल्यवान अधिकार छीन लेता है, जो संघ के पास था