22. औद्योगिक विवाद विधेयक - Page 257

240 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

और उसे किसको देता है? यह उसे बंधक संघ को देता है, जैसा कि मैं अभी बताने वाला हूं। अगर वह स्वतंत्र संघ को दिया जाता, तो मुझे बुरा नहीं लगता। महोदय! फिर ऐसा क्यों हुआ, यह समझने के लिए एक आवश्यक मुद्दा है; ऐसा क्यों है कि इस विधेयक के अंतर्गत पंजीकृत संघ को 1926 के केन्द्रीय अधिनियम के तहत भी पंजीकरण कराने की आवश्यकता है? महोदय! यह और कुछ नहीं बल्कि राजनैतिक या आर्थिक लाभ पाना है, जैसा कि अमरीका वासी कहते हैं। मेरे माननीय मित्र चाहते हैं कि इस विधेयक के तहत बने संघों को न सिर्फ समझौता अधिकारियों के समक्ष प्रतिनिधित्व करने का अधिकार मिले, बल्कि वह उस राजनैतिक प्रतिनिधित्व को भी आसानी से रौंद डाले, जो कि 1926 के अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत संघ को मिला है। यह हड़प करने की नीति है।

और यह सब राजनैतिक व आर्थिक शक्तियों की बंदरबाट किसके फायदे के लिए है? मैं फिर कहता हूं कि यह बंधक संघों के लिए है। निस्संदेह, अगर मेरे माननीय मित्र सोचते हैं कि मालिक की अनुमति के सिद्धांत पर आधारित संघवाद में कुछ गलत नहीं है, तो मेरा कोई झगड़ा नहीं है। यह उनके जीवन का दर्शन है न कि मेरे जीवन का, अगर वह सोचते हैं कि एक व्यक्ति, जो कि दास बना हुआ है, वह मुक्त व्यक्ति है तो यह उनका दृष्टिकोण है, अगर वह सोचते हैं कि उद्योग में शांति रहे, इसलिए कर्मचारी को अपने मालिक से बंधा रहना चाहिए, तो यह भी उन्हीं का सोचना है, इसमें मेरा कोई झगड़ा नहीं है। लेकिन अपने लिए मैं इस स्थिति को जानने के लिए तैयार नहीं हूं। हम केवल मात्र शांति नहीं चाहते और फिर मैं उस तरह की शांति को नकारता हूं, जैसी कि हमने चाही है। (श्री एस.वी. पारूलेकर : सही है) निश्चित रूप से यह उस आदमी की शांति है, जिसका पेट भरा हुआ है और जिसकी तोंद फूली हुई है। मुझे उस तरह की शांति नहीं चाहिए।

जिस प्रश्न में मेरी रुचि है, वह यह है कि मैं मामले का उदार दृष्टिकोण अपनाने को तैयार हूं और मैं जानना चाहता हूं कि क्या यह उदार दृष्टिकोण परवान चढ़ेगा। जैसा कि मेरे माननीय मित्र ने कहा है, ऐसा हो सकता है कि भारत में कोई संवाद न हो; ऐसे भी लोग हो सकते हैं जो संघों के विकास को नष्ट कर रहे हों। मुझे आश्चर्य है कि उन्हें अभी भी साम्यवादी दल के सदस्यों के डर पर विचार करना चाहिए, जो पहले कांग्रेस की तरफ से कंटक थे, लेकिन अब जो उसमें सम्मिलित हो गए हैं — वे खुले आम शांति चाहते हैं, वे खुले आम सच्चाई चाहते हैं, वे खुले आम अहिंसा चाहते हैं, यहां तक कि जैसा मैं समझता हूं, उन्होंने चार आने भी खर्च किए हैं। क्यों, मैं पूछता हूं क्या उन्हें अब इस बात का डर है कि कोई मजदूरों के शांतिपूर्ण विकास के खेल को नष्ट कर रहा है? मान लें ऐसा है, तो चलिए देखते हैं, इसका अंत कैसे होता है। अगर मेरे माननीय मित्र मुझे संतुष्ट कर दें कि ऐसा समय आएगा, जब जिसे मैं बंधक संघ कहता हूं, वह स्वतंत्र संघों में विकसित होगा, तो संभवतया मैं अपने दृष्टिकोण पर दुबारा विचार करूं। परंतु मुझे यह कहने में