औद्योगिक विवाद विधेयक
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बिल्कुल भी हिचक महसूस नहीं होती कि कभी भी स्वतंत्र संघ नहीं होंगे और यह इसलिए क्योंकि उन्होंने स्वतंत्र संघ पर जो शर्तें लागू की हैं, वे इतनी असंभव हैं कि कभी पूरी नहीं हो सकतीं। मुक्त संघ की क्या शर्तें हैं, शर्तें ये हैं कि आप हमेशा यह दिखाएं कि रजिस्टर में आपके पास 50.1 प्रतिशत सदस्यता है। 20 प्रतिशत पर्याप्त नहीं है, 25 प्रतिशत पर्याप्त नहीं है, अगर आप स्वतंत्र होना चाहते हैं, तो 50.1 प्रतिशत का गणितीय अनुपात दिखाएं। महोदय! मैं यह पूछना चाहता हूं कि क्या यह तर्कसंगत शर्तें हैं? अगर मैं रोम के कानून — सादृश्यता का प्रयोग करूं, तो यह दास बनाने से शुरू होता है। अगर पारिभाषिक ढंग से कहें, तो इसमें भी दास मुक्ति का प्रावधान था। अंततः दासों को मुक्त कर दिया गया और वे स्वतंत्र व्यक्ति बन गए, नागरिक बन गए। उसी सादृश्यता को लागू करते हुए, मैं कहूं कि हमने भी दासता से शुरुआत की क्योंकि स्वीकृति व मान्यता दासता से कुछ कम नहीं थी। लेकिन क्या दास मुक्ति का कोई प्रावधान है? और अगर ऐसा कोई प्रावधान है, तो क्या वह तर्कसंगत है और कोई ऐसी संभव शर्तें हैं, जिन्हें कर्मचारियों से पूरा करने की उम्मीद की जा सके? शर्त यह है कि तब आप कर्मचारियों की कुल संख्या में से 50.1 प्रतिशत अवश्य दिखाएं और तभी आप अपने मालिक के बंधन, और दंड से बच सकते हैं। क्या यह संभव होने योग्य शर्तें हैं?
महोदय! अब मेरे माननीय मित्र, जो शायद हमें पथभ्रष्ट कहना चाहेंगे, हमारा ध्यान अहमदाबाद में विद्यमान आदर्श स्थिति की ओर आकर्षित करना चाहते हैं। हमें कहा गया है कि अहमदाबाद की पुस्तक से एक पृष्ठ निकाल लें और उस आदर्श का पालन करें। मैं ऐसा करने को तैयार हूं। चूंकि मैंने उदाहरण का अध्ययन किया है, इसलिए यह प्रश्न पूछना आवश्यक हो जाता है, इस विधेयक के अंतर्गत अहमदाबाद मजूर-महाजन के स्वतंत्र संघ हो जाने की क्या कोई संभावना है? मुझे कोई आशा नहीं है कि वह संघ स्वतंत्र कर्मचारियों का संघ बन सकता है। निश्चित रूप से अहमदाबाद एक आदर्श स्थान है, जैसा कि राजकीय कमीशन ने इंगित किया है कि भारत में कहीं भी ऐसी आदर्श संस्था विद्यमान नहीं है। वहां ऐसे कर्मचारी हैं, जिनका धर्म वही है, जो मालिक का है, सिर्फ उन कुछ मुसलमानों को छोड़कर जो बुनकर हैं और जो संघ के बाहर हैं। कर्मचारी वही भाषा बोलते हैं, जो कि उनके मालिक। वहां सांस्कृतिक एकता प्रचुर मात्रा में विद्यमान है। इसलिए अन्य स्थितियों में जो भी पृथकतावादी एवं दुर्दांत प्रवृत्तियां हो सकती हैं, वे वहां विद्यमान नहीं हैं। इन सबसे बढ़कर वहां महात्मा जैसा महान व्यक्तित्व है, जिस पर शायद प्रत्येक दुर्दांत श्रद्धा रखे और उनका अनुसरण करे, चाहे उसकी कितनी ही व्यक्तिगत शिकायतें क्यों न हों। अहमदाबाद मजूर-महाजन संघ इनके ही तत्त्वावधान में विकसित हुआ है। उसका जीवन दो दशकों से ज्यादा का है, मुझे बताया गया है कि वह अठारह वर्षों से विद्यमान है। उस संघ की क्या स्थिति है? मेरे पास मई 1938 का लेबर गजट