250 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
नहीं है। रजिस्ट्रार केवल संघ की स्थापना के उद्देश्यों की और इस बात की कि क्या सात लोगों ने आवेदन पर हस्ताक्षर किए हैं, जांच करने का अधिकारी है। इसके अतिरिक्त उसे किसी और बात से कोई मतलब नहीं है। पुराने कानून के अंतर्गत यही स्थिति थी, यानी वह व्यक्ति जो एक बार अयोग्य ठहराया जा चुका हो, वह बिना किसी कानूनी अड़चन के पंजीकरण करा सकता है। जो लोग मजदूरों को संगठित करना चाहते हैं, उनकी राह में यह विधेयक निरंतर बाधाएं उत्पन्न करता है, क्योंकि उन्होंने कभी किसी तरह का धोखा किया था या गलत तथ्य प्रस्तुत किए थे। विधेयक के प्रावधानों के बारे में मैं यही कहना चाहता था।
निस्संदेह यह कहा जा सकता है कि क्या यह विधेयक कर्मचारी व नियोक्ता के साथ व्यवहार में समानता लाता है, क्योंकि जैसे कि यह विधेयक कर्मचारियों की हड़ताल होने पर दंड की व्यवस्था करता है, यह मालिकों द्वारा की गई तालाबंदी के लिए भी दंड की व्यवस्था करता है। मुझे नहीं लगता कि इस स्थिति को कायम रखा जा सकता है, क्योंकि मेरी जानकारी में ऐसे एक-दो मामले आए हैं, जिसमें नियोक्ता व कर्मचारी के बीच भेदभाव किया गया है। उदाहरणस्वरूप, मैं खंड 28 के तहत नोटिस के प्रश्न का उल्लेख करता हूं : (1) यदि नियोक्ता स्थायी आदेशों में कोई परिवर्तन चाहे तो उसे नोटिस देना होगा, और (2) सूची-2 में दिए औद्योगिक मामलों के संबंध में जब आप कर्मचारी के पास आते हैं, तो स्थायी कानून में किसी परिवर्तन के लिए उसे नोटिस देना होगा और किसी भी औद्योगिक मामले में सूची-2 तक सीमित रहना आवश्यक नहीं है। निश्चित रूप से यह समानता की स्थिति नहीं है। जहां तक उपस्थिति का सवाल है, नियोक्ता अगर उपस्थित नहीं होगा, तो निश्चित रूप से दंडित नहीं किया जाएगा। लेकिन अगर संघ उपस्थित न हो तो मजदूर को उपस्थिति के लिए बाध्य किया जा सकता है। अगर और कोई नहीं है, तो भी श्रम अधिकारी तो है ही, जो मजदूरों का प्रतिनिधित्व कर सकता है और सुलह के बाद किया गया समझौता मजदूर को बाध्य भी कर सकता है। हालांकि मजदूर ने सुलह को अस्वीकार किया और वे उस अधिकारी के द्वारा अपने हितों का प्रतिनिधित्व कराने के लिए तैयार नहीं थे। ये तुच्छ बातें हैं। इसके अतिरिक्त जिस बात पर मैं जोर देने की कोशिश कर रहा हूं, महोदय! वह यह है कि हम जो चाहते हैं वह सुलह नहीं है। हम निष्पक्षता चाहते हैं। मैं इस सदन के समक्ष यह आग्रह करना चाहता हूं कि यह जरूरी नहीं कि सुलह निष्पक्ष हो (व्यवधान)। मैं इसे प्रमाणि् ात करके रहूंगा। हम समाज में निष्पक्षता लाएं, ताकि उससे समाज को न्याय मिल सके। इसके लिए हमें विभिन्न वर्ग के लोगों के साथ समान रूप से व्यवहार करना होगा। दूर क्यों जाएं और आयकर का ही मामला लें। मैं वित्तीय प्रबंध का छात्र था, इसलिए मुझे यह दृष्टांत तुरंत याद आ गया। हमारे पास उत्तरोत्तर आयकर की व्यवस्था क्यों है? हम सब पर एक-सा आयकर क्यों नहीं लगाते? हम अमीर पर