22. औद्योगिक विवाद विधेयक - Page 268

औद्योगिक विवाद विधेयक 251

उच्च दर से और गरीब पर निम्न दर से आयकर इसलिए लगाते हैं, क्योंकि दोनों की आयकर देने की क्षमता भिन्न है। देखें, मान लें कि एक परिवार के कई सदस्यों में से एक बीमार है। बीमार व्यक्ति स्वस्थ हो जाए, इसके लिए हम उसे चिकन सूप देते हैं। लेकिन हम और लोगों को चिकन सूप नहीं देते हैं। बीमार व्यक्ति को चिकन सूप देने पर और अन्य स्वस्थ व्यक्तियों को न देने पर घर में कोई भी मां को दोष नहीं देता। हम निष्पक्षता चाहते हैं, तो ऐसे में निष्पक्षता उत्पन्न नहीं की जा सकती कि हम शक्तिशाली और कमजोर, अमीर और गरीब, अज्ञानी और बुद्धि मान को एक निगाह से देखने की बात करें। अगर मेरे माननीय मित्र दोनों वर्गों को निष्पक्षता से देखना चाहते हैं, तो वह विधेयक यथेष्ट नहीं है। उन्हें विधेयक में अन्य प्रावधान प्रस्तावित करने होंगे और मैं पूछना चाहता हूं कि क्या वे विधेयक में ऐसे प्रावधानों को प्रस्तावित करने के लिए तैयार हैं।

हमारे उद्योगों में आजकल क्या हो रहा है? मुझे खेद है कि इस अवसर पर मैं जो महसूस करता हूं, उसे साफ शब्दों में कहना होगा। बंबई नगर में हमारे यहां ऐसी मिलें हैं, जो पारसियों, गुजरातियों, यहूदियों या यूरोपियनों द्वारा संचालित की जाती हैं। मैं बचपन में इन सब मिलों में गया हूं, क्योंकि मेरे परिवार के कई सदस्य वहां काम करते थे। वहां मैं उनका खाना लेकर जाया करता था। अभी हाल में भी मैं एक-आध बार कई मिलों में गया था। इन मिलों के बारे में सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि इन्हें प्रबंधकां के रिश्तेदारों के लिए स्वर्ग बना दिया गया है। हजारों व्यक्ति उनमें निरर्थक कार्यरत हैं और सिर्फ इसलिए क्योंकि वे किसी न किसी रूप में प्रबंधकों से जुड़े हैं। आप पारसी मिल में जाइए, वहां आप देखेंगे कि अनेक पारसी व्यक्ति काम कर रहे हैं, चाहे उनकी जरूरत है या नहीं। यहूदियों द्वारा संचालित मिलों में जाइए, वहां आपको सैकड़ों यहूदी नियुक्त मिलेंगे, भले ही वहां उनकी जरूरत हो या नहीं। कर्मचारियों की कमाई का एक अच्छा हिस्सा प्रबध्ांक ले लेते हैं, ताकि मिल में काम करने वाले इन लोगों को खिला सकें, चाहे वह कार्यकुशल हैं या नहीं और उन्हें इनकी जरूरत है या नहीं। मिलों को नियंत्रित कर रहे ये सब लोग पूंजी को उड़ा देते हैं और कागजी लिखा पढ़ी से उसे छुपा देते हैं। जब कर्मचारी यह कहता है कि उसे कम मजदूरी मिलती है, तो मिल का नियंत्रण करने वाले लोग कहते हैं, ‘यह मेरी पूंजी है’, यह सब जाली पूंजी है, शेयर बाजार की पूंजी है, सट्टेबाजों द्वारा लगाई हुई पूंजी है, उद्योगों की कमाई का बड़ा हिस्सा इन लोगों द्वारा उड़ा दिया जाता है और जो थोड़ी बहुत बच जाती है, कर्मचारियों से कहा जाता है कि वे उसी से अपनी आजीविका चलाएं। अगर माननीय प्रधानमंत्री निष्पक्षता लाना चाहते हैं, तो सर्वप्रथम उद्योगों के लाभ के अनुसार कर्मचारियों की मजदूरी में परिवर्तन करना चाहिए। समझ में नहीं आता है कि मिल मालिक या यूं कहें कि किसी भी उद्योग के किसी मालिक को कानूनी तौर पर अपना वार्षिक बजट क्यों नहीं पेश करने को