उपद्रव जांच समिति की रिपोर्ट
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जा रहा। मैं समझता हूं कि अगर कोई जांच की सच्चाई का पता लगाना चाहे, तो उसको बहुत कुछ कहना पड़ेगा, क्योंकि अपनी ओर से बोलते हुए मैं निश्चित रूप से देख रहा हूं कि जिस साक्ष्य पर उस जांच का निष्कर्ष आधारित है और जो संघर्ष समिति के सदस्यों द्वारा कथित रूप से दिए गए भाषण जो इस रिपोर्ट में पृष्ठ 10 से आगे दिए हुए हैं, वे सब मेरे विचार में इन निष्कर्षों से मेल नहीं खाते। जैसे कि मैंने कहा है कि मैं इस जांच रिपोर्ट को तर्क की खातिर तथ्य के रूप में ले रहा हूं और जो प्रश्न मैं माननीय गृह मंत्री से पूछने जा रहा हूं वह यह है, क्या वह समझते हैं कि यह रिपोर्ट सही है? अगर वह कहते हैं कि यह रिपोर्ट सही है, तो क्या वह संघर्ष समिति के सदस्यों पर इस हिंसा को बढ़ाने और उकसाने के लिए मुकदमा चलाने को तैयार हैं? अपनी ओर से मैं कह सकता हूं कि जहां तक इस संघर्ष समिति से मेरा संबंध है, मैं अपनी जांच करवाने के लिए तैयार हूं। कोई भी व्यक्ति जिसमें साहस हो, आत्मविश्वास हो, जो इस साक्ष्य पर विश्वास करता हो, वह आगे आए और मुझ पर मुकदमा चलाए। मैं अपनी जांच करवाने और कानून जो भी सजा दे, उसे भुगतने के लिए तैयार हूं। यह मेरा पहला सवाल है। दूसरा सवाल जो मैं माननीय गृह मंत्री महोदय से पूछने वाला हूं, वह यह है, और वह भी जांच-समिति के उस निष्कर्ष पर आधारित है, जिसे जैसा कि मैंने कहा, मैं तर्क के लिए स्वीकार कर रहा हूं। मैंने सोचा कि जिस मुख्य प्रश्न के प्रति समिति का सरोकार है, वह गोली चलाने के औचित्य का प्रश्न है। समिति ने कहा कि गोली चलाना उचित था और इसके कारण थे। मेरा विश्वास है कि समिति ने यह भी रिपोर्ट दी है कि बिना गोली चलाए हिंसा रोकी नहीं जा सकती थी। दूसरे शब्दों में, इस उद्देश्य के लिए उतनी ही गोली चलाई गईं, जितनी जरूरी थीं। जैसा कि मैंने कहा है कि मैं जांच के निष्कर्षों को केवल तर्क की खातिर स्वीकार कर रहा हूं, इसलिए मैं माननीय गृह मंत्री से दूसरा प्रश्न भी पूछ रहा हूं, क्या वह उन पुलिस अफसरों पर जो गोली चलाने में शामिल थे, साधारण अदालत में मुकदमें चलाने के लिए तैयार हैं और क्या इस समिति की जांच रिपोर्ट का किसी न्यायाधीश या न्यायविद द्वारा अनुमोदन कराने के लिए तैयार हैं? महोदय! मैं इस सदन को यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि जहां तक कानून का संबंध है, उसमें साधारण नागरिक और एक पुलिस अफसर और एक सैनिक अफसर में कोई अंतर नहीं है और मैं सदन के लाभ के लिए एक प्रतिष्ठित दस्तावेज से एक छोटा पैरा पढ़ना चाहता हूं। मुझे विश्वास है कि मेरे माननीय मित्र गृह मंत्री इस रिपोर्ट के बारे में जानते हैं। वह है, फीदरस्टोन उपद्रव समिति की रिपोर्ट। रिपोर्ट के एक पैरे में कहा गया है :
अधिकारियों और सैनिकों को कोई विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है और न ही उनका
* बोंबे लेजिस्लेटिव असेम्बली डिबेट्स, खंड 7, पृ. 1968-69, 25 अक्तूबर 1939