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युद्ध में भागीदारी *
I
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : महोदय! मैं व्यवस्था का प्रश्न उठाता हूं। यह प्रस्ताव के उस भाग से संबंधित है, जिसमें यह कहा गया है :
यह विधान सभा खेद प्रकट करती है कि भारत के संबंध में ब्रिटिश सरकार
द्वारा उनकी तरफ से दिए गए बयान को आधिकारिक रूप से प्रस्तुत करते समय
भारत की परिस्थिति को ठीक ढंग से नहीं समझा गया है।
महोदय! मैं बंबई विधान सभा के नियम 75 के आधार पर बोल रहा हूं, जो प्रस्ताव के स्वरूप एवं विषय-वस्तु के बारे में है। यह नियम इस प्रकार है :
इन नियमों में समाहित निबंधनों के अधीन साधारण जन के हित के मामले पर
एक प्रस्ताव पारित किया जा सकता है :
बशर्ते कि ऐसा कोई भी प्रस्ताव नहीं किया जा सकता जो निम्नांकित शर्तों को
पूरा नहीं करता हो : अर्थात,
(क) यह साफ-साफ और यथावत व्यक्त किया जाएगा और एक निश्चित मुद्दे
को उठाएगा . . .
मेरा मानना है कि प्रस्ताव का अंतिम भाग न केवल अस्पष्ट है, बल्कि अत्यधिक अस्पष्ट है। प्रस्ताव का वह भाग जिसका मैं उल्लेख कर रहा हूं, कहता है कि ‘ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत की परिस्थिति को ठीक ढंग से नहीं समझा गया है।’ मेरा मानना है कि यह सदन यह जानने का हकदार है कि किस रूप में भारत सरकार ने भारत की परिस्थिति को ठीक ढंग से नहीं समझा है। इस दृष्टि से प्रस्ताव का यह हिस्सा अस्पष्ट है। सदन के सभी निर्णयों को परिचालित करने वाले मूलभूत सिद्धांतों में से एक यह है कि सदन जो भी निर्णय ले, इसकी व्याख्या करने का काम किसी बाहरी व्यक्ति पर नहीं छोड़ना चाहिए। सदन को स्पष्ट शब्दों में कहना चाहिए कि वह क्या निर्णय ले रहा है और इस बारे में मैं एक पूर्व उदाहरण को आधार बना रहा हूं जिसका उल्लेख अध्यक्षों की नियम पुस्तिका (डाइजेस्ट ऑफ रूलिंग्स, बोंबे लेजिस्लेटिव काउंसिल) के पृष्ठ 148 पर नियम संख्या 24 में किया गया है :