260 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
प्रस्ताव स्पष्ट होना चाहिए, न कि अस्पष्ट। न तो परिषद और न ही सरकार
को ऐसे अस्पष्ट प्रस्ताव में भागीदार बनना चाहिए, जो इसके अर्थ को पूरी तरह
स्पष्ट नहीं करता।
मैंने खंड 4 (1921), पृष्ठ 772 का इस व्यवस्था के सबंध में उल्लेख किया और मैंने देखा है कि यह व्यवस्था माननीय सदस्य धनजीशाह कपूर के द्वारा प्रस्तुत उस प्रस्ताव के संशोधन के फलस्वरूप दी गई, जिसमें सिंचाई के पानी के वितरण का उल्लेख किया गया था और उनके संशोधन में कुछ ऐसे उपाय सुझाए गए थे, ‘जो जहां तक व्यावहारिक हों।’ तब व्यवस्था का प्रश्न इस बात पर उठाया गया था कि यह एक अस्पष्ट संशोधन था और इसकी अनुमति नहीं दी गई थी। मेरा निवेदन है कि जिस मामले का मैं उल्लेख कर रहा हूं, जहां तक इस प्रस्ताव का संबंध है, वह भी इस व्यवस्था से परिचालित होता है, और इसलिए इसे अव्यवस्थित घोषित कर देना चाहिए।
माननीय श्री बी.जी. खेर : मेरा निवेदन है कि जिस नियम का मेरे माननीय मित्र ने उल्लेख किया है, उसका यहां कोई उपयोग नहीं है। नियम केवल यह कहता है कि प्रस्ताव को साफ-साफ एवं यथावत उल्लिखित होना चाहिए। मेरा प्रस्ताव कहता है ‘यह विधान सभा खेद प्रकट करती है कि भारत के संबंध में ब्रिटिश सरकार ने भारत के बारे मेंं वक्तव्य दिया है, उसे प्राधिकृत करते समय भारत की परिस्थिति को ठीक ढंग से नहीं समझा गया है।’ इसलिए प्रश्न और निश्चित मुद्दा यह है : क्या ब्रिटिश सरकार की तरफ से दिया गया बयान भारत की परिस्थिति को सही तरह से प्रस्तुत करता है? यही स्पष्ट और यथावत मुद्दा है, और इसमें कोई भी अस्पष्टता नहीं है। मेरा यह भी निवेदन है कि यह एक वैसा ही स्पष्ट मुद्दा है, जैसा कि नियम 75 (क) में विचारित हुआ है। इसलिए माननीय सदस्य द्वारा उठाई गई आपत्ति का यहां कोई मतलब नहीं है, जहां तक व्यावहारिक है, इस बारे में दी गई व्यवस्था को मैं पूरी तरह समझता हूं, क्योंकि उसका अर्थ कुछ भी हो सकता है। यहां हम एक वक्तव्य का उल्लेख कर रहे हैं, वह वक्तव्य कोई अज्ञात मामला नहीं है, वह मामला सदन के समक्ष है, और . . .
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : मैं इस तथ्य पर माननीय प्रधानमंत्री का ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं कि शब्दावली यह है कि ‘भारत की परिस्थिति को ठीक ढंग से नहीं समझा गया है।’ मेरा निवेदन है कि सदन यह जानने के लिए अधिकृत है कि किस अर्थ में भारत सरकार ने परिस्थिति को ठीक-ठाक नहीं समझा है।
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डॉ. भीमराव अम्बेडकर * (बंबई नगर) : महोदय! मैं निम्नांकित चार संशोधन पेश करना चाहता हूं। मेरा पहला संशोधन है . . .
माननीय अध्यक्ष : मैं इसे एक संशोधन के रूप में ले रहा हूं।