युद्ध में भागीदारी
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डॉ. भीमराव अम्बेडकर : मैं प्रस्ताव करता हूं कि इन शब्दों को निकाल दिया जाए :
और भारतीय जनमत की पूर्णतः अनदेखी करते हुए आगे कानून पारित कर दिए
गए हैं और प्रांतीय सरकारों की शक्तियों और गतिविधियों को कम करने वाले
कानून बनाए गए हैं और उपाय किए गए हैं।
माननीय श्री के.एम. मुंशी : महोदय! यह व्यवस्था का प्रश्न है। आपके पिछले निर्णय में कहा गया है कि माननीय सदस्य डॉ. अम्बेडकर के चारों संशोधनों को एक संशोधन के रूप में लिया जाए, हो सकता है कि सदन इस संशोधन का एक भाग स्वीकार करे और बाकी न करे। तब यदि इसे एक संशोधन के रूप में लिया गया, तो दिक्कत पैदा हो जाएगी।
माननीय अध्यक्ष : यद्यपि इसे इस संशोधन के रूप में लिया जाए, तो भी जब इसे मतदान के लिए रखा जाएगा, तो इसे दो भागों में बांटा जा सकता है। यही सदन की इच्छा है, तो मैं ऐसा जरूर करूंगा।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : आगे ‘अपना संविधान स्वयं बनाने के लिए हकदार’ शब्दों के स्थान पर निम्नांकित को जोडि़ए :
और यह है कि ब्रिटिश सरकार इस बात से सहमत है कि इस संविधान को तब
मान्यता देगी, जब अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा नियुक्त प्रतिनिधि संतुष्ट हो जाएंगे
कि संविधान इन समुदायों के जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा करता है।
‘भारत की शासन व्यवस्था’ के बाद ये शब्द जोड़े जाएं :
यह माना जाए कि यह कार्रवाई उक्त समुदायों के इन मूल अधिकारों का
अल्पीकरण नहीं करेगी कि देश के शासन को चलाने वाली मशीनरी में उन
समुदायों के मान्यता प्राप्त प्रतिनिधियों की आवाज सुनी जाती रहेगी।
‘व्यवस्था सहित’ से शुरू होकर ‘भारत के संबंध में’ से अंत होने वाले समूचे भाग को निकाल दिया जाए।
प्रश्न प्रस्तुत किया गया।
माननीय अध्यक्ष : प्रस्तावित संशोधन के बाद यह प्रस्ताव इस रूप में पढ़ा जाएगा यह विधान सभा खेद प्रकट करती है कि ब्रिटिश सरकार ने बिना भारत की जनता की सहमति लिए ग्रेट ब्रिटेन एवं जर्मनी के बीच युद्ध में भारत को भागीदार बना दिया है। यह विधान सभा सरकार से भारत सरकार को और उसके द्वारा ब्रिटिश सरकार को यह प्रेषित करने की अनुशंसा करती है कि वर्तमान युद्ध के घोषित लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए भारतीय जनता का सहयोग पाने के लिए यह जरूरी है कि लोकतंत्र के सिद्धांतों को भारत पर लागू किया जाए और उसकी नीतियां उसके लोगों द्वारा निर्देशित होनी चाहिएं और यह कि भारत को अपना संविधान बनाने के लिए अधिकृत एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए और यह कि अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा नियुक्त प्रतिनिधियों के माध्यम से संतुष्ट हो जाने पर ऐसे