24. युद्ध में भागीदारी परिशिष्ट - Page 281

264 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

जीवन में यह अवधि जोड़ दे। उनको ऐसा कोई नहीं मिला। सौभाग्यवश उनका बेटा पुरु जो एक अत्यंत कर्तव्यनिष्ठ पुत्र था, जो बहुत ही छोटा था और जिसे स्वयं अपने लिए युवावस्था की जरूरत थी, वह आगे आया और अपने जीवन का एक हिस्सा पिता को अर्पित कर दिया। महोदय! मैं आपको आश्वस्त करता हूं कि मेरे पीछे जो सदस्य बैठे हैं और अगर मैं कहूं, मेरा संबंध उनके साथ पिता-पुत्र का है, वे सब अपने समय में से कुछ हिस्सा निकालकर मुझे देने पर सहमत हो गए हैं। लेकिन मैं जानता हूं कि जब तक आप इसे स्वीकृति प्रदान नहीं कर देते और इसका अनुमोदन नहीं करते, यह समय जोड़ा नहीं जा सकता। यह हो सकता है कि समय जोड़ना जरूरी हो जाए, तो मैं इसी आशा के साथ आगे बढ़ूंगा कि आप अंततः इसकी स्वीकृति दे देंगे।

माननीय प्रधानमंत्री द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव का फिर से उल्लेख करते हुए मैं यही कहूंगा कि मेरे विचार से यह प्रस्ताव अनुचित और असामयिक प्रतीत होता है। यह प्रस्ताव सदन से एक निश्चित घोषणा करने की मांग करता है और फिर सदन को, इन मांगों के पूरा न होने की दशा में, एक निश्चित प्रक्रिया विधि का अनुमोदन करने का आह्वान करने के लिए कहता है। सबसे पहले, मैं यह जानना चाहूंगा कि ये मांगें किसने की हैं। स्पष्टतः महामहिम वायसराय से की गई मांगें इस सदन द्वारा नहीं की गई थीं। माननीय प्रधानमंत्री ने देश की ओर से मांगों को रखने के लिए और महामहिम वायसराय के पास उन मांगों को भेजने से पहले सदन का समर्थन लेने के लिए इस सदन को उचित स्थान नहीं समझा। मांगें, जैसा कि हम जानते हैं, उनके द्वारा प्रस्तुत की गईं जिन्हें माननीय प्रधानमंत्री ‘आलाकमान’ कहेंगे और मैं कहता हूं कि यह आलाकमान और कुछ नहीं केवल मंत्रियों की कठोर कार्रवाइयों को रोकने के लिए नियुक्त निगरानी समिति है (ठहाका)। मेरा निवेदन है कि वह उचित स्थान था, जहां मांगों को रखा जाना चाहिए था। उन्होंने ऐसा करने के लिए इसे नहीं चुना। अगर वह सभा पटल पर रखी गई थीं, तो वे संविधान से अनभिज्ञ और सदन के अपरिचित व्यक्तियों के समर्थन से पारित हो गईं, और ऐसा होने के बाद, वे शांति से सदन में आते हैं और कहते हैं ‘स्थिति बिगड़ गई है, हमारे बचाव के लिए आओ।’ मेरा निवेदन है कि यह सबसे अधिक अपमानजनक प्रक्रिया है।

दूसरी बात जो मुझे इस प्रस्ताव के बारे में कहनी है, वह यह है कि इसमें कुछ निश्चित शब्दों में घोषणा की मांग की गई है। अब मुझे ऐसा लगता है कि महामहिम वायसराय द्वारा एक निश्चित ढंग से घोषणा कर दी गई है। इस महीने की 18 तारीख को भारत के लोगों को इस घोषणा का पता चला, इसके बाद पूरे सात दिन बीत चुके हैं। अब सदन जो कुछ अपनी पूरी गरिमा के साथ कर सकता है, वह यह व्यक्त करना है कि यह घोषणा संतोषजनक नहीं है, लेकिन प्रस्ताव ऐसा नहीं करता। यद्यपि यह एक घोषणा है, तथापि माननीय प्रधानमंत्री ने बिना यह व्यक्त