युद्ध में भागीदारी
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किए कि यह घोषणा स्वीकार्य है या नहीं, या कोई दूसरी घोषणा होनी चाहिए या नहीं, इस प्रस्ताव को शब्दबद्ध किया है। यह पूरा प्रसंग अत्यंत तुच्छ प्रतीत होता है। मैं उस विवाद में नहीं पड़ना चाहता, क्योंकि मेरे माननीय मित्र प्रधानमंत्री ने विपक्षी सदस्यों से इस प्रस्ताव को इस रूप में स्वीकार करने का निवेदन किया है, मानो यह विवाद रहित मामला हो। लेकिन मैं कहूंगा कि यह यदा-कदा ही होता है कि कुत्तों को कुत्ता खाने का मौका मिले और यह प्रस्ताव वैसा ही है, तो भी मैं माननीय प्रधानमंत्री के आह्वान का उत्तर देने के लिए तैयार हूं और सभा पटल पर रखे गए प्रस्ताव और संशोधन को विवाद रहित ही समझूंगा।
महोदय! चूंकि मैं इस समय प्रस्ताव पर और संशोधनों पर भी कुछ टिप्पणी करने जा रहा हूं, इसलिए मैं प्रारंभ में ही सदन को बताना चाहता हूं कि मैं किन बातों में प्रस्ताव से सहमत हूं। जहां प्रस्ताव कहता है कि भारत को बिना भारत के लोगों की राय के ब्रिटेन और जर्मनी के बीच हो रहे युद्ध में भागीदार बनाया गया है, मैं पूर्ण रूप से इसका समर्थन करता हूं। वास्तव में, मुझे एक कदम और आगे जाना चाहिए था, क्योंकि स्थिति वास्तव में बहुत असामान्य है। यहां हम ब्रिटिश मंत्रिमंडल के रथ के पहियों से बांध दिए गए हैं। ब्रिटिश मंत्रिमंडल अंग्रेज साम्राज्य की विदेश नीति को नियंत्रित करता है। विदेश नीति के निर्धारण और युद्ध की घोषणा में इस देश की कोई आवाज नहीं होती। संभवतया जनता में से कुछ लोगों को वरसाई या अन्य स्थान पर जाने के लिए निमंत्रण दिया जाना चाहिए, जहां शांति संधि पर हस्ताक्षर होने हैं, ताकि दस्तावेज पर उनके नाम दर्ज हो सकें। मुझे निश्चित रूप से पता है कि इसके सिवाए देश की और कोई भूमिका नहीं होगी। यह सचमुच बहुत ही असामान्य स्थिति है। मैं कहता हूं कि भारत को उपनिवेशों की तुलना में ग्रेट ब्रिटेन की विदेश नीति में कहीं ज्यादा हिस्सा लेने का अधिकार है। जैसा कि माननीय प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में उल्लेख किया है कि स्टेट्यूट ऑफ वेस्टमिनस्टर के तहत यह उपनिवेश पर निर्भर है कि वह खुद को निष्पक्ष घोषित करे और उस युद्ध के दुष्परिणामों से अपने को दूर रखे, जिसके लिए वह जिम्मेदार नहीं है। दुर्भाग्यवश, हमें उपनिवेश का दर्जा प्राप्त नहीं है। हमें अपने आपको निष्पक्ष घोषित करने का अधिकार नहीं है। बिना हमारी इच्छा के और बिना हमारी सहमति के हमें इस हत्याकांड में धकेल दिया जाता है और मैं कहता हूं कि अगर यह वस्तुस्थिति है, तो यह जोर देने के लिए कि हम से हमेशा परामर्श किया जाए हमारे पास अन्य उपनिवेश से ज्यादा अधिकार हैं। इसलिए जहां तक प्रस्ताव के उस अंश का सवाल है, मैं उसे पूरा समर्थन देता हूं।
एक दूसरी बात भी है, जिसका मैं संक्षिप्त उल्लेख करना चाहूंगा। यद्यपि इस देश को बिना इसकी सहमति के युद्ध में शामिल कर लिया गया है, तथापि जैसा कि यह प्रस्ताव ठीक ही कहता है, सुरक्षा के दृष्टिकोण से यह देश सर्वाधिक सुरक्षाहीन