युद्ध में भागीदारी
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उपनिवेशों ने सोचा कि एक आदमी जो युक्ति संगत बातों के सिवाए और किसी में विश्वास नहीं करता और जो ऐसा करना एक प्राथमिकता मानता है, वही एक उचित आदमी हो सकता है, जिसे अपने लिए संविधान बनाने को कहा जाए। मेरा विश्वास है कि उन्होंने उसके पास सलाह के तौर पर संक्षिप्त ब्यौरे देते हुए अपने दूत भेजे। दक्षिण अमरीका में अनेक उपनिवेश थे, जो सब पुराने स्पेनी साम्राज्य से टूटे थे। जेरमी बेंथम ने दक्षिण अमरीका के इन देशों का संविधान बनाने का काम बड़ी खुशी से अपने हाथों में लिया। उसने बड़ी मेहनत करके विस्तृत दस्तावेज तैयार किए। मैं देखता हूं कि प्रधानमंत्री हंस रहे हैं, क्योंकि वह इन तथ्यों को जानते हैं। जेरमी बेंथम द्वारा बनाए गए संवैधानिक दस्तावेज जहाज द्वारा दक्षिण अमरीका भेजे गए, जिससे लोगों के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा हो सके और अगर मैं ऐसा कह सकता हूं तो लोकतांत्रिक सिद्धांतों में सामंजस्यता लाई जा सके, जब संविधान वहां पहुंचे, तो कुछ वर्षों तक दक्षिण अमरीकी लोगों द्वारा उनका उपयोग किया गया और उसके बाद जेरमी बेंथम के द्वारा बनाए गए सभी संविधान विखंडित हो गए और वहां के लोगों की समझ में नहीं आया कि वहां से आई हुई अतिरिक्त प्रतियों का क्या किया जाए और सभी दक्षिण अमरीकी लोगों ने तय किया कि उन्हें सार्वजनिक रूप से जला दिया जाए।
महोदय! जिस मुद्दे पर मैं जोर दे रहा हूं, वह यह है कि किसी संविधान को निश्चय ही किसी सूट की तरह बिल्कुल फिट होना चाहिए। जो संविधान फिट नहीं होता, वह संविधान नहीं, वह संविधान हो ही नहीं सकता। उदाहरण के लिए जिस कोट को माननीय गृह मंत्री अपने छरहरे बदन पर पहने हुए हैं, वह मेरे जैसे मोटे शरीर पर फिट नहीं बैठेगा (ठहाका)। क्या यह फिट बैठ सकता है? क्या कुबड़े के लिए बना सूट किसी सामान्य पीठ वाले आदमी पर फिट बैठ सकता है (ठहाका)? क्या एक जूता जो उस आदमी के लिए दुरुस्त है, जो जमीन पर अपने पैर दृढ़तापूर्वक और सीधा रखता है, क्या वह टेढ़ी टांगों वाले आदमी को दुरुस्त बैठ सकता है? ऐसा नहीं हो सकता। इसलिए लोकतंत्र के बारे में बात करते हुए हमें तथ्यों पर खरे उतरने वाले सिद्धांतों की बात करनी चाहिए। अब, जिस मुद्दे की मैं व्याख्या करने जा रहा हूं, वह यह है, क्या लोकतंत्र का सिद्धांत भारत के लोगों के लिए उचित होगा? मेरे माननीय मित्र प्रधानमंत्री ने यह स्पष्ट नहीं किया कि वह लोकतंत्र के सिद्धांत को किस तरह लेते हैं, लेकिन वह लोकतंत्र का मतलब जो लेते हैं, उसके अनुसार उसे मैं बहुतम का शासन समझता हूं, क्योंकि जब तक हम सभी बहुमत के शासन को मूल कार्यकारी सिद्धांत स्वीकार नहीं करते, तब तक राजनैतिक लोकतंत्र नहीं आ सकता। स्पष्टतः यही मूल है, यही आधार है, यही तरीका हे, जिससे हमें इस प्रश्न पर बहस करने के लिए आगे बढ़ना चाहिए।
महोदय! अब मैं समझता हूं कि हर व्यक्ति विपक्ष के नेता के इस विचार से