24. युद्ध में भागीदारी परिशिष्ट - Page 285

268 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

सहमत होगा कि तथ्यों को देखते हुए केवल एक वस्तु अपरिवर्तनीय है और वह अपरिवर्तनीय वस्तु यह है कि हिन्दू बहुसंख्यक रहेंगे और मुसलमान तथा अनुसूचित जातियां अल्पसंख्यक रहेंगी। मैं मानता हूं कि यह एक निर्विवाद तथ्य है। एक तथ्य जिसे चाहे हम एक वस्तु में विश्वास करें या अन्य में, हम सबको जरूर स्वीकार लेना चाहिए। अब मेरे लिए यह प्रश्न बहुत सरल है और मैं इसका विवेचन शुद्ध रूप से उनके दृष्टिकोण से करने जा रहा हूं, जिन्हें इस देश में अछूत कहा जाता है। मैं शुरुआत में सदन से कहूंगा कि इस सापेक्ष स्थिति को ध्यान में रखें, जो इस देश के लोकतंत्र में हम प्राप्त करेंगे। इस लोकतंत्र के अंतर्गत जिसे हमारे प्रधानमंत्री इस देश में स्थापित करना चाहते हैं, एक वस्तु, जैसा कि मैंने कहा अपरिवर्तनीय होगी, वह यह है कि इसमें हिन्दू बहुसंख्यक होंगे और इस समूची भूमि पर सर्वत्र बिखरे हुए देश के हर गांव में टूटी-फूटी कच्ची झोंपडि़यों का एक झुंड मिल जाएगा, जहां अछूत कहे जाने वाले लोग रहते हैं। हर गांव के साथ लगे हुए ऐसे मोहल्लों को आप पाएंगे, जिनमें हिन्दू होंगे और एक महारवाड़ा या चमारवाड़ा या एक भंगीवाड़ा, जो भी आप कहें, उन मोहल्लों के साथ लगा होगा। यह एक अपरिवर्तनीय तथ्य होगा।

अब मेरे माननीय मित्र मुझसे लोकतंत्र पर बोलने के लिए कह रहे हैं। ठीक है, मैं समझता हूं कि वह मुझे यह कहने की अनुमति देंगे कि इस प्रश्न का मेरा उत्तर इस पर निर्भर करेगा कि बहुसंख्यक मेरे साथ कैसा व्यवहार करेंगे। क्या ये बहुसंख्यक सहिष्णु बहुसंख्यक हैं? क्या ये बहुसंख्यक समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व को स्वीकार करते हैं? क्या ये बहुसंख्यक मुझे जीने की, सांस लेने की, बढ़ने की अनुमति देंगे?

माननीय श्री बी.जी. खेर : निश्चय ही, ये अनुमति देंगे।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : बहुसंख्यकों का व्यवहार कैसा है? यही एकमात्र प्रश्न है, जिस पर विचार किया जाना है। मेरे माननीय मित्र ने कहा है — ‘हां’। लेकिन हमें तथ्यों को देखना चाहिए। मैं अतीत या प्राचीन इतिहास में नहीं जा रहा हूं। मैं 1929 से शुरू करना चाहता हूं। सदन जानता है कि 1929 में बंबई विधान परिषद ने एक प्रस्ताव द्वारा, जो दलित वर्ग और आदिम जनजातियां कहलाते हैं, उनकी शिकायतों की जांच के लिए एक समिति बनाई थी। उस समिति की अध्यक्षता श्री स्टार्टे नामक एक अधिकारी ने की, जो जरायमपेशा जनजातियों का मामला देख रहा था। मैं उस समिति का एक सदस्य था। मेरे सहयोगी डॉ. सोलंकी भी सदस्य थे, बाकी सभी सदस्य हिन्दू थे। मैं विशेषकर एक आदमी की चर्चा करूंगा, जो इस समिति के सदस्य थे और वह थे श्री ठक्कर, क्योंकि मैं जानता हूं कि मेरे माननीय मित्र प्रधानमंत्री मेरे प्रमाणों के बजाए डॉ. ठक्कर के प्रमाण पर ज्यादा शीघ्रता से विश्वास करेंगे। महोदय, 1928 में अधिकांश हिन्दुओं का व्यवहार दलितों के प्रति कैसा था? मैं इस रिपोर्ट के एक पैरा को पढ़ने के लिए आपकी अनुमति चाहूंगा।