24. युद्ध में भागीदारी परिशिष्ट - Page 286

युद्ध में भागीदारी

इस रिपोर्ट के पैरा 102 में उल्लेख है :

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यद्यपि हमने दलित वर्ग को सार्वजनिक सुविधाओं का उनका अधिकार दिलाने

के लिए विभिन्न उपायों का अनुमोदन किया है, तथापि हमें आशंका है कि आने

वाले लंबे समय तक उन्हें उन अधिकारों का उपयोग करने में बाधा आएंगी।

प्रथम डर तो रूढि़वादी वर्ग द्वारा उनके खिलाफ होने वाली खुली हिंसा का

है। यह जरूर ध्यान में रखा जाए कि दलित वर्ग हर गांव में छोटे अल्पसंख्यक

वर्ग के रूप में है, जिनके खिलाफ एक बड़ा रूढि़वादी वर्ग किसी भी कीमत पर

अल्पसंख्यक वर्ग के किसी भी तथाकथित आक्रमण से अपने हितों और अपना

दबदबा बनाए रखने के लिए तत्पर है। पुलिस द्वारा अभियोग लगाए जाने के

खतरे ने रूढि़वादी वर्ग को हिंसा के उपयोग से काफी रोका है और इस तरह

के मामले यदा-कदा ही होते हैं।

दूसरी कठिनाई इस आर्थिक दशा से उत्पन्न होती है, जिसमें दलित वर्ग आजकल है। प्रेसिडेंसी के अधिकांश हिस्सों में दलित वर्ग को आर्थिक आजादी नहीं है। कुछ रूढि़वादी वर्ग की जमीन पर उनके कमेरे के रूप में उनकी इच्छा पर खेती करते हैं। अन्य रूढि़वादी वर्गों के यहां खेतिहर मजदूर के रूप में अपना पेट पालते हैं और बाकी रूढि़वादी वर्ग के ग्रामीण नौकर के रूप में सेवा करने के बदले दिए गए भोजन या अनाज पर जीवन निर्वाह करते हैं। हमने ऐसे अनेक उदाहरणों के बारे में सुना है कि जब भी कुछ गांवों में दलित वर्ग ने अपने अधिकारों का उपयोग करने का साहस किया, रूढि़वादी वर्ग ने अपनी आर्थिक शक्ति का इस्तेमाल करके दलित वर्ग को जमीन से बेदखल कर दिया और यह बहिष्कार इतने बड़े पैमाने पर आयोजित किया जाता कि गांव के द्वारा उन्हें दैनिक उपयोग की वस्तुएं बेचने को और आम रास्तों तथा पड़ावों का दलित वर्ग द्वारा उपयोग को भी निषिद्ध कर दिया जाता। प्रमाणों के अनुसार कभी-कभी छोटे कारण भी दलित वर्ग के सामाजिक बहिष्कार की घोषणा के लिए पर्याप्त होते हैं। दलित वर्ग द्वारा सार्वजनिक कुएं का उपयोग करने के अधिकार के इस्तेमाल करने पर अक्सर ऐसा ही होता है, लेकिन ऐसे मामले किसी भी तरह कम नहीं होते, जिनमें एक कठोर बहिष्कार की घोषणा सिर्फ इसलिए होती है, क्योंकि एक दलित वर्ग के आदमी ने जनेऊ पहन लिया या एक टुकड़ा जमीन खरीद ली या अच्छे कपड़े या आभूषण पहन लिए या दुल्हे को घोड़ी पर बैठाकर बारात को सार्वजनिक गलियों से ले गए।

यह स्थिति 1928 में थी। मुझे जो प्रश्न पूछना है, वह यह है — क्या 1928 के बाद से कोई परिवर्तन आया है? अब, जहां तक मेरे पास प्रमाण उपलब्ध हैं, मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि स्थिति न केवल वैसी है, बल्कि उससे भी बदतर हुई है। मैं अपने दावे के समर्थन में कुछ उदाहरण दूंगा।

जिस पहली चीज का मैं उल्लेख करूंगा, वह 1932 के चुनाव हैं, जो विधान