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युद्ध में भागीदारी

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डॉ. भीमराव अम्बेडकर : तथ्य इस प्रकार थे। उस गांव के किसी ब्राह्मण ने अछूत समुदाय के कुछ लोगों पर हमला किया। मैं यदि ऐसा कहूं तो, शायद अपनी हिमाकत में यह सोचते हुए कि इन अछूतों के लिए यह संभव था कि इस ब्राह्मण पर मुकदमा चलाएं और उसे दंडित करें, उनके दिमाग में हमलावर के खिलाफ शिकायत करने के लिए जिला पुलिस के पास जाने का विचार आया। इस बीच जो हुआ, वह यह है। जिस दिन अछूत घरों पर गांव की ऊंची जाति के हिन्दुओं द्वारा हमला हुआ। उनके घर ध्वस्त कर दिए गए, छतों को गिरा दिया गया। यह जानकर कि पुरुष सदस्य उनके वार सहने के लिए मौजूद नहीं हैं, ये सभी भद्र व्यक्ति यह सोचते हुए कि लोग रात में आएंगे, शाम तक वहीं बैठे रहे। कुछ औरतें जिन्हें उनकी योजना की जानकारी हो गई थी, वे गांव से बाहर खिसक गईं और पुरुषों से रात में आधे रास्ते में मिलीं और उनसे कहा कि गांव में आना बहुत ही

खतरनाक है, क्योंकि उनकी जिंदगी सुरक्षित नहीं है। इन लोगों ने रात गांव से बाहर बिताई और वे वापस नहीं लौटे। दूसरे दिन, वे एक-एक, दो-दो होकर छुपकर आए, ताकि उनके आने का पता न चले, उन्होंने देखा कि उनकी सारी झोपडि़यां ध्वस्त की जा चुकी थीं। इसके साथ ही उन्हें पता चला कि गांव ने उनका बहिष्कार कर दिया है। उन्हें गांव के बनिए से कुछ खरीदने की अनुमति नहीं थी। इतना ही नहीं, गांव वालों ने ढेर सारी मात्रा में मिट्टी का तेल खरीदा और इसे पानी भरने के उन स्थानों पर डाल दिया, जहां से ये लोग पानी लेते थे। तब इन अछूतों ने सोचा कि कुछ किया जाना चाहिए। उन्होंने सोचा और जैसा कि उन्हें गलत सलाह मिली कि उन्हें कानून की शरण लेनी चाहिए। वे फिर गए और शिकायत की। उनके कुछ कांग्रेसी मित्रों ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने क्या किया? क्या उन्होंने उन बेचारे अछूतों की उनके अधिकार पाने में मदद की? नहीं, उन्होंने उनको शिकायत वापस लेने और चुपचाप समर्पण करने के लिए राजी कर लिया। समूची बात का सबसे दुःखद पहलू यही है। कविता के इन अछूतों ने क्या गलती की थी? उनको इस ढंग से क्यों प्रताडि़त किया गया? इसके सिवाए और किसी कारण से नहीं कि कविता के अछूतों ने अपने बच्चों में से चार को उस स्कूल में भेजने का आग्रह किया, जिसमें सरकार के आदेश के अनुसार उन्हें दाखिला मिलना चाहिए था।

दूसरा मामला जिस पर मैं आ रहा हूं, वह एक भंगी लड़के का मामला है, जो दुर्भाग्यवश एक तलाठी के रूप में नियुक्त किया गया। उसका नाम परमार कालिदास शिवराम है। आपकी सहमति से, मैं वह निवेदन करना चाहता हूं, जो परमार कालिदास शिवराम ने बंबई में श्री इंदुलाल याज्ञिक की अध्यक्षता में होने वाली एक सार्वजनिक सभा में कहा, जिसमें मैं भी उपस्थित था। मैं कहानी सुनकर बुरी तरह हिल गया। मैंने उसे सारी घटना को लिखित रूप में देने के लिए कहा। जो उसने मुझे लिखित में दिया, उसका मैंने केवल अनुवाद किया है। कहानी इस प्रकार है :