युद्ध में भागीदारी
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देते थे, क्योंकि उन्हें उन हिन्दुओं के नाखुश होने का भय था, जिन्हें मेरा क्लर्क रूप में रहना पसंद नहीं था। खाने के संबंध में और भी अधिक कठिनाई थी। कोई भी ऐसा स्थान या व्यक्ति नहीं था, जहां मैं खाना ले सकता था। मैं सुबह-शाम भुजिया खरीदता, गांव के बाहर किसी एकांत स्थान में उसे खाता और वापस आकर मामलातदार के कार्यालय के बरामदे के फर्श पर सो जाता था। इस प्रकार मैंने चार दिन बिताए। मेरे लिए यह सब असहनीय हो गया। तब मैं रहने के लिए अपने पूर्वजों के गांव जेन्त्रल चला गया। यह बोरसाद से छह मील दूर था। प्रतिदिन मुझे बारह मील पैदल चलना पड़ता था। यह मैंने डेढ़ महीने तक किया। इसके बाद मामलातदार ने काम सीखने के लिए मुझे एक तलाठी के पास भेजा। यह तलाठी तीन गांवों जेन्त्रल, कानपुर और सैजपुर का प्रभारी था। जेन्त्रल उसका मुख्यालय था। मैं दो महीने तक तलाठी के साथ जेन्त्रल में रहा। गांव का प्रधान
खासकर क्रोधी और आक्रामक प्रकृति का था। एक बार उसने कहा — तुम्हारे बाप, भाई गांव के कार्यालय में झाडू लगाते हैं और तुम इस कार्यालय में हमारे बराबर बैठना चाहते हो। ध्यान रखो, बेहतर है कि तुम नौकरी छोड़ दो। एक दिन तलाठी ने गांव की आबादी की तालिका बनाने के लिए मुझे सैजपुर बुलाया। जेन्त्रल से मैं सैजपुर गया। मैंने मुखिया और तलाठी को गांव के कार्यालय में कुछ काम करते पाया। मैं गया, दरवाजे के पास खड़ा रहा, उनको नमस्ते की, लेकिन उन्होंने मेरी ओर कोई ध्यान नहीं दिया। मैं करीब 15 मिनट तक बाहर खड़ा रहा। मैं अपने जीवन से ऊब गया। उपेक्षा और अपमान के कारण मैं गुस्से में था। मैं वहां पड़ी एक कुर्सी पर बैठ गया। मुझे कुर्सी पर बैठा देखकर प्रधान और तलाठी मुझसे बिना कुछ कहे ही बाहर चले गए। कुछ समय के बाद कुछ लोग गांव के पुस्तकालय में आने लगे। मैं यह नहीं समझ सका कि क्यों एक शिक्षित आदमी ने इस भीड़ का नेतृत्व किया है। इसी क्रम में मैंने जाना कि यह कुर्सी उसकी है। उसने मुझे भद्दी गालियां देनी शुरू कर दीं। गांव के नौकर रावनिया को संबोधित करते हुए उसने कहा — किसने भंगी के इस गंदे कुत्ते को कुर्सी पर बैठने की इजाजत दी है? रावनिया ने मुझे उठाया और मुझसे कुर्सी ले ली। मैं जमीन पर बैठ गया। वहीं भीड़ ने उस गांव के कार्यालय में प्रवेश किया और मुझे घेर लिया। उत्तेजित भीड़ थी, क्रोध से भरी हुई थी। उनमें से कुछ मुझे गालियां दे रहे थे और कुछ धारिया से काटकर टुकड़े करने की धमकी दे रहे थे। मैं उनसे क्षमा और दया की भीख मांग रहा था। भीड़ पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। मैं नहीं समझ पा रहा था कि खुद को कैसे बचाऊं। लेकिन मेरे दिमाग में एक विचार आया कि मैं मामलातदार को अपने ऊपर आए दुर्भाग्य के बारे में लिखूं और उससे कहूं कि अगर मैं उस भीड़ द्वारा मारा जाऊं, तो मेरे शरीर को किस प्रकार निबटाना है। संयोगवश, मुझे आशा थी कि यदि भीड़ यह जान पाए कि मैं उनके खिलाफ वास्तव में मामलातदार