24. युद्ध में भागीदारी परिशिष्ट - Page 291

274 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

को लिख रहा हूं, तो वे अपना हाथ रोक सकते हैं। मैंने रावनिया से कागज का

एक टुकड़ा देने के लिए कहा, जो उसने दिया। तब मैंने उस पर अपने कलम

से बड़े-बड़े अक्षरों में नीचे पत्र लिखा, ताकि सभी इसे पढ़ सकें :

सेवा में,

मामलातदार,

तालुक बोरसाद

महोदय,

परमार कालिदास शिवराम का नम्र प्रणाम स्वीकार करें। आपको यह नम्र सूचना

दी जाती है कि आज मेरे ऊपर एक नीच मृत्यु का हाथ पड़ने जा रहा है। मैंने

अपने मां-बाप की बात मानी होती तो ऐसा नहीं होता। मेरी मृत्यु के बारे में मेरे

माता-पिता को सूचित करने की कृपा करें।

अब, मैं अनुसूचित जाति के लोगों के प्रति बहुसंख्यकों के व्यवहार के कुछ उदाहरणों का उल्लेख करूंगा। एक मामला जामनेर तालुका के केक्तनिम्भोर गांव का है। जो इस प्रकार है :

इस गांव के दलित वर्ग ने किसी भी हिन्दू त्योहार को मनाना छोड़ दिया और

जीने का एक साफ-सुथरा तरीका अपना लिया। छुट्टी के एक दिन उन्हें ऊंची

जाति के हिन्दुओं ने होली के लिए जंगल से गाय का गोबर लाने को कहा।

उन्होंने वैसा किया। लेकिन वे होली नहीं मनाते थे, अतः उन्होंने उच्च जाति

के हिन्दुओं के लिए आग की व्यवस्था नहीं की। इसलिए हिन्दू उनकी बस्ती में

घुस आए, उनके घरों में जाकर उन्हें मारा और उनका कठोर बहिष्कार करने

की घोषणा की तथा उनकी जिंदगी दूभर बना दी।

दूसरा मामला जामनेर तालुक के वदाली गांव का है। उस गांव में दलित वर्ग की एक बारात को गांव के आम रास्ते पर ले जाने की अनुमति नहीं दी गई। बारात

खदेड़ दी गई और उच्च जाति के हिन्दुओं ने उसी दिन विवाहोत्सव नहीं होने दिया। दलित वर्ग के लोगों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया।

इसके बाद अमलनेर तालुक के मांदेड़ का भी एक और मामला है। मांदेड़ में दलित वर्ग के लोगों ने एक सभा की और वहां बुरी आदतों का परित्याग करने का और जीवन को साफ-सुथरे ढंग से बिताने का संकल्प किया। ऊंची जाति के कुछ हिन्दुओं को यह विचार पसंद नहीं आया। उन्होंने एक छोटे सुअर को मार डाला और उसे दलित वर्ग के पीने के पानी में डाल दिया। यह तरीका दो बार दोहराया गया। दलित वर्ग के लोग अभी सामाजिक रूप से बहिष्कृत हैं और पीडि़त किए जाते हैं। इस उत्पीड़न के कारण दलित वर्ग के बहुत से लोगों ने अपना स्थान छोड़ दिया।

महोदय! मैं उन अनगिनत मामलों को दोहराना नहीं चाहता, जो यह दर्शाते हैं कि बहुसंख्यक हिन्दू अछूतों के संबंध में कितने असहिष्णु हैं। मैं यह कह सकता हूं