24. युद्ध में भागीदारी परिशिष्ट - Page 293

276 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

कि जहां तक जनसंख्या का सवाल है, हिन्दू न केवल बहुसंख्यक हैं, बल्कि जहां तक प्रशासन का सवाल है, हिन्दू वहां भी बहुसंख्यक हैं और जो प्रश्न मैं माननीय प्रधानमंत्री से पूछना चाहता हूं, वह यह है। मैं समझता हूं कि मैंने उन्हें विश्वास दिला दिया है कि हिन्दू बहुसंख्यकों को विरोधी बहुसंख्यक के रूप में गिनना चाहिए। वह अपना सिर हिला रहे हैं। वह अपने निष्कर्ष निकाल सकते हैं। मैं उनसे झगड़ा नहीं करूंगा। मगर असली स्थिति यही है। उत्पीड़न के खिलाफ अछूतों को कैसा संरक्षण मिलता है? मैं कुछ और मामले लेकर यह दिखलाना चाहता हूं कि पूरा प्रशासन इस प्रकार का है कि यह उच्च जाति के हिन्दुओं से भरा हुआ है, निश्चय ही अछूतों के प्रति शत्रुतापूर्ण है। जब झगड़े में एक तरफ उच्च जाति के हिन्दू और दूसरी तरफ अछूत होते हैं तो न तो वह चाहते हैं और न उनकी इच्छा होती है और वे न्याय करने की ओर ध्यान भी नहीं देते।

अब, जिस पहले मामले का मैं उल्लेख करना चाहता हूं वह इस प्रकार है। मैं संख्या दे रहा हूं, ताकि मेरे माननीय मित्र जांच करवा सकें। यह प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट, संगमनेर की फाइल में 1938 के फौजदारी मुकदमा संख्या 191 पर दिया गया निर्णय है। इस मुकदमें में सात हिन्दुओं पर भारतीय दंड संहिता की धारा 147 अर्थात् दंगा करना, 323, 341, 452, 454 और 149 धारा के तहत आने वाले अपराध का अभियोग लगाया गया था। तथ्य संक्षेप में इस प्रकार थे। यह शिकायत बड़गांव लंगड़ा नामक गांव में रहने वाले एक अछूत की थी। उसका मामला यह था कि किसी दिन गांव के दो सौ लोगों ने छड़ी, लाठियों और दूसरे हथियारों से लैस महारों के घरों पर हमला किया और उन्होंने न केवल पुरुषों को आहत किया, बल्कि महिलाओं को भी। घाव बहुत गहरे थे। वे कई दिन तक अस्पताल में रहे। सौभाग्यवश उनके लिए पुलिस ने मुकदमें को संगीन मुकदमें के रूप में लिया, क्योंकि जख्म गहरे थे, उन्हें ऐसा करना ही था। इन लोगों पर संगमनेर के प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट की कचहरी में मुकदमा चलाया गया। पुलिस के द्वारा प्रमाण दिए गए। इस बात के प्रचुर डॉक्टरी प्रमाण थे कि उन्हें जख्मी किया गया था। तो भी क्या हुआ? और अगर मैं कहूं, इन सात मुजरिमों ने अपने अपराध को पूरी तरह महसूस करते हुए मुझे कहलाया कि समझौते के तौर पर वे उन आहत महार पुरुषों और महिलाओं को 300 रुपए देने को तैयार हैं। अपने अकिंचन विचार से मैंने महारों को समझौता न करने की बल्कि कानून को अपना काम करने देने की सलाह दी। लेकिन कानून ने क्या किया? मजिस्ट्रेट ने क्या किया? सबको आश्चर्य होता है कि मजिस्ट्रेट ने सभी मुजरिमों को छोड़ दिया।

डॉ. के.बी. आंत्रोलीकर : महोदय! क्या यह माननीय मित्र के लिए उचित है कि वह मजिस्ट्रेट के निर्णय पर कोई टिप्पणी करें।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : निश्चित रूप से। मैं तथ्य बता रहा हूं।