24. युद्ध में भागीदारी परिशिष्ट - Page 294

युद्ध में भागीदारी

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माननीय अध्यक्ष : मैं इस मुद्दे पर सोच रहा था। लेकिन मैं उन तथ्यों को सुनना चाहता था, जो माननीय सदस्य कह रहे थे। मैं नहीं समझता कि उनके लिए यह उचित है कि वह मजिस्ट्रेट के फैसले की आलोचना करें।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : मैं आलोचना नहीं कर रहा। मैं केवल तथ्य बता रहा हूं। मैं इस उदाहरण से बता रहा हूं कि हम लोग कितना संरक्षण पाते हैं। अछूत जो संरक्षण पाते हैं, उस पर विचार होना चाहिए यही निवेदन मैं सदन से कर रहा हूं। मैं निर्णय को किसी भी प्रकार चुनौती नहीं दे रहा। जो मैं कह रहा हूं, वह यह है कि वे लोग जो हृदय से महसूस करते थे कि वे अपराधी हैं और क्षतिपूर्ति के रूप में 300 रुपए देकर समझौता करने के लिए तैयार थे, उन्हें अंतत : मजिस्ट्रेट द्वारा छोड़ दिया गया और जिस मुद्दे पर मैं जोर देना चाहता हूं, वह यह है : यह हमला क्यों हुआ? यह हमला क्यों हुआ, इसका सीधा सा कारण यह था कि अछूतों ने मजिस्ट्रेट के पास एक आवेदन लिखने की जुर्रत की, कि जंगलात की कुछ जमीन उन्हें दी जाए। इन लोगों का बस यही अपराध था। दूसरा मामला जिस पर . . .

माननीय अध्यक्ष : माननीय सदस्य की अभिव्यक्ति का उपयोग करते हुए मैं माननीय सदस्य में ‘कंपकंपी’ नहीं पैदा करना चाहता। लेकिन मैं उन्हें केवल ध्यान दिलाना चाहता हूं कि वह पूरा एक घंटा ले चुके हैं। वह कुछ और समय लेंगे, इसमें संदेह नहीं है। किंतु जिन मामलों को वह प्रस्तुत कर रहे हैं यदि वह मामलों के छोटे-छोटे ब्यौरे में जाएंगे, जैसा कि वह कर रहे हैं, तो दूसरा घंटा भी पर्याप्त नहीं होगा। मेरी इच्छा है कि बहस जल्दी ही किसी निष्कर्ष पर पहुंच जाए।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : महोदय! मैं अपने तर्क को पूरा करने के लिए दो अन्य मामलों का उल्लेख करना चाहता हूं। दूसरा मामला, जिसमें अछूत यह समझते हैं कि प्रांत के अफसर उनको यह संरक्षण देने में असफल हो गए हैं, जिसके कि वे अधिकारी हैं। यह मामला अकुशी गांव का है। इस गांव में जो घटना हुई, वह इस प्रकार थी। यह गांव सतारा जिले के वाई तालुका में है। तथ्य बहुत सीधे से हैं। उस गांव में अछूतों और सवर्ण हिन्दुओं के बीच कोई रंजिश थी। अछूत और हिन्दू लड़ रहे थे। लेकिन अछूतों ने निर्णय किया कि एकादशी के दिन वे देव-दर्शन के लिए जाएंगे। उच्च जाति के हिन्दू जिन्होंने उनके खिलाफ बहिष्कार की घोषणा की थी, वे नहीं चाहते थे कि अछूत देव-दर्शन को जाएं। इसके बावजूद अछूत गए। फल यह हुआ कि गांव के पटेल ने, अन्य गांव वालों के साथ, उन अछूतों पर हमला किया, जो देव-दर्शन के लिए गए थे। हमेशा की तरह अछूतों ने गांव के पटेल के खिलाफ शिकायत दर्ज की। स्थिति यह थी : पटेल जानता था कि वह दोषी है। उसको सम्मन जारी किया गया। वह बाहर चला गया और उसने सम्मन नहीं लिया। तब उसके दरवजे पर सम्मन चिपका दिया गया। वह तीन महीने गायब रहा। अंततः वह आया और कानून ने अपना काम शुरू किया। इस मामले में भी विद्वान मजिस्ट्रेट