278 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
ने, जिन्होंने मामले की जांच की, उस अभियुक्त को, जो यह अच्छी तरह से जानता था कि वह दोषी है, उसे छोड़ देना उचित समझा।
दूसरा मामला जिसका मैं संक्षिप्त उल्लेख करना चाहता हूं, पूना जिले के मुलथी पेटा में थाटवाड़ी गांव का है। उस मामले में जो हुआ, वह यह था, यह एक इनाम का गांव है। किसी आदमी ने इनामदार के कोई दो या तीन पेड़ काट लिए। इनामदार ने पुलिस से शिकायत की, कि कुछ महारों ने (उसने किसी का नाम नहीं बताया) उसके पेड़ काट लिए और लकडि़यां चुरा लीं। जिस पुलिस कर्मचारी ने छान-बीन की, उसने मजिस्ट्रेट की अदालत में चार आदमियों को अभियुक्त बनाया। अब जो हुआ, वह यह था कि मुकदमें के दौरान अभियुक्तों की तरफ के वकील ने सरकारी वकील को गढ़ी गई सूचना देने और उन चारों अभियुक्तों के नाम की चर्चा करने को कहा, हालांकि वस्तुतः किसी नाम की कोई चर्चा वहां नहीं थी, उसने बाद में चार महारों के नाम अभियुक्त के रूप में जोड़ दिए। सौभाग्यवश, महारों को छोड़ दिया गया लेकिन यह तथ्य बना हुआ है कि वे पुलिस अफसर, जिनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे इन अछूतों को सुरक्षा देंगे, वे भी उनको ऐसे मामले में फंसाने के लिए साक्ष्य गढ़ने की हद तक चले जाते हैं।
अब मैं और किसी उदाहरण की चर्चा नहीं करूंगा। मैं समझता हूं कि यह कहानी घिनौनी है, निश्चय ही मुझमें घृणा भरती है। मैं जानता हूं कि समग्र रूप में हिन्दू किसी की परवाह नहीं करते। वे इसकी हंसी उड़ाते हैं। वे केवल यही समझते हैं कि इस देश की समस्या केवल हिन्दू और मुसलमान के बीच की समस्या है। मैं उन्हें कहना चाहता हूं कि यह और ज्यादा गंभीर समस्या है और न केवल हिन्दुओं ने, बल्कि सरकार ने भी इन लोगों का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा है। मेरे द्वारा सभा पटल पर रखे गए इन दो संशोधनों के समर्थन में कोई तर्क देने की आवश्यकता हो, तो मैं समझता हूं कि जिन तर्कों को मैंने अभी सदन में प्रस्तुत किया है, वह पर्याप्त है। किसी भी संविधान में इन संशोधनों के अंतर्गत अछूतों को पर्याप्त संरक्षण मिलना चाहिए। मैं जानता हूं कि दूसरे पक्ष की ओर से निश्चित उत्तर दिया जाएगा। माननीय गृह मंत्री के द्वारा दो संशोधन सभा पटल पर रखे जा चुके हैं। मैं उन्हें स्पष्ट कहना चाहूंगा कि मैं उन संशोधनों को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं हूं और अब मैं सदन को बताऊंगा कि अपने संशोधन के बजाए मैं उनके संशोधन को स्वीकार क्यों नहीं कर सकता?
माननीय गृह मंत्री का पहला संशोधन इस उद्देश्य से है कि संविधान अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त रक्षोपाय करेगा। मेरा कथन बहुत सीधा है और वह यह है कि न केवल हमें रक्षोपाय मिलने चाहिए, बल्कि ये ऐसे हों, जिनसे हमें तसल्ली हो। यह एक मूल मुद्दा है। माननीय गृह मंत्री स्पष्टतः यह मानते हैं कि वह अछूतों के संरक्षक हैं और यह कि एक संरक्षक के रूप में वह उस संविधान में कुछ प्रावधान