युद्ध में भागीदारी 279
लागू कर सकते हैं, जो उनके अनुसार अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए पर्याप्त हों। अब, तत्काल यह कहना चाहता हूं कि मैं इस दृष्टिकोण को खारिज करता हूं। मेरा कोई संरक्षक नहीं है, मैं अपना संरक्षक खुद हूं। वे अपना संविधान बना सकते हैं, किंतु हम अपने अधिकारों का दावा करेंगे। जो भी प्रावधान वे हमारे रक्षोपायों के संबंध में बनाते हैं, उनको दलित वर्ग के विश्वसनीय प्रतिनिधियों द्वारा प्रमाणित किया जाना चाहिए कि वे समुचित उपाय हैं। पर्याप्तता की उनकी परिभाषा मुझे संतुष्ट नहीं करेगी और यही कारण है कि मैं अपने विद्वान मित्र द्वारा प्रस्तुत किए गए संशोधन को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं हूं।
दूसरे संशोधन के संबंध में, निस्संदेह माननीय गृह मंत्री केवल आधी दूर तक जाना चाहते हैं। वह यह मानने के लिए तैयार हैं कि देश के प्रशासन में अल्पसंख्यकों की आवाज होनी चाहिए। यहां भी मुझे लगता है कि उनके और मेरे बीच कुछ निश्चित मतभेद हैं। मेरे दूसरे संशोधन की भाषा बहुत सोच समझकर लिखी गई है। मैंने ‘मूल अधिकार’ शब्द के प्रयोग का विशेष ध्यान रखा है और मैं कुछ हद तक इसकी व्याख्या करना चाहता हूं कि क्यों मैंने इस अभिव्यक्ति ‘मूल अधिकार’ का प्रयोग किया है। संविधान की रचना के दौरान जो एक चीज मैंने महसूस की है, वह यह है, चाहे हम इसे मानें या न मानें, इस देश का राजनैतिक तंत्र चातुर्वर्ण्य प्रणाली को प्रतिबिंबित करता है। उस तंत्र प्रणाली में सिद्धांत यह था : क्षत्रियों को राज करना चाहिए, ब्राह्मणों को सलाह देनी चाहिए, वैश्य को व्यापार करना चाहिए, लेकिन शूद्र या आदि शूद्र को सेवा करनी चाहिए। प्राचीन समय में यही स्थिति थी। मैं पाता हूं कि राजनीति में यह स्थिति कुछ हद तक बदली है। वैश्य अब व्यापार नहीं करते। अगर वह व्यापार करते हैं, तो केवल राजनीति का व्यापार करते हैं (ठहाका)। एक चीज फिर भी अपरिवर्तनीय रही है, और वह यह है कि शूद्रों को इस देश के प्रशासन में कोई भागीदारी नहीं मिलेगी। जैसा कि मैं इस देश की परिस्थितियों को देखता हूं, जैसा कि मैं पूरे भारत में बने अलग-अलग मंत्रिमंडलों के राजनैतिक गठन को देखता हूं, तो मैं पाता हूं कि जब कि हम अछूत सामाजिक रूप से शूद्र या आदि शूद्र हैं, वहीं कांग्रेस सरकार, अगर कांग्रेस सरकार नहीं, तो परिस्थितियों की मांग इस प्रकार की है कि अंततः ये हमें राजनैतिक शूद्र बनाकर ही छोड़ेंगे। मैं इसे बर्दाश्त नहीं करूंगा। इस परिस्थिति को निर्मूल करने के लिए मेरे खून की अंतिम बूंद भी गिरेगी। (शोर-शराबे के बीच सुनिए, सुनिए की आवाज) मैं इसे बर्दाश्त नहीं करूंगा कि हिन्दुओं द्वारा प्रयुक्त मेरे ऊपर, जो सामाजिक दबदबा, आर्थिक दबदबा और धार्मिक दबदबा है, उसमें राजनैतिक दबदबा भी जुड़ जाए। मैं फिर दोहराता हूं कि मैं इसकी अनुमति कभी नहीं दूंगा। हम लोग शासक वर्ग के कुलीन तंत्र की स्थापना के उद्देश्य से राजनीति में होने वाली विकृति के खिलाफ यथाशक्ति लड़ेंगे। मैं इसकी अनुमति नहीं दूंगा, मैं दोहराता हूं कि मैं ऐसे संविधान की अनुमति नहीं दूंगा, जिसमें उनके लिए स्वतंत्रता और हमारे ऊपर आधिपत्य होगा। मैं