युद्ध में भागीदारी 281
अपना लोकतंत्र ले सकते हैं।’ मुझे विश्वास है कि यह एक ऐसी स्थिति है, जिससे कोई नहीं लड़ सकता।
अंत में मैं एक शब्द कहूंगा। मैं जानता हूं कि देश में मेरी स्थिति को ठीक से नहीं समझा गया है। इसे अक्सर गलत समझा गया है। इसलिए इस अवसर पर मुझे अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। महोदय! मैं यह कहता हूं कि जब भी मेरे व्यक्तिगत हितों और समूचे देश के हितों के बीच टकराव हुआ है, तब-तब मैंने देश के दावे को अपने दावों के ऊपर रखा है। (सुनो, सुनो)। मैंने कभी भी निजी लाभ का रास्ता नहीं पकड़ा। अगर मैंने अपने पत्ते ठीक से खोले होते, जैसा कि दूसरे करते हैं, तो मैं किसी अन्य जगह पर हो सकता था। मैं इसके बारे में कुछ कहना नहीं चाहता, लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। गोलमेज सम्मेलन में मेरे सहयोगी थे, जो मुझे विश्वास था कि ऐसी बात का समर्थन करेंगे कि जहां तक देश की मांग का संबंध है, मैं कभी पीछे नहीं रहा हूं। सम्मेलन में कई यूरोपीय समुदाय ऐसी परेशानी महसूस कर रहे थे कि जैसे मैं सम्मेलन में कोई डरावना व्यक्ति होऊं। लेकिन मैं इस देश के लोगों के दिमाग में यह शंका नहीं रहने दूंगा कि मेरी दूसरी वफादारी भी है, जिससे मैं बंधा हूं और जिसे मैं कभी नहीं छोड़ सकता। वह वफादारी अछूतों का समुदाय है, जिससे मैं पैदा हुआ हूं, मैं जिसमें रहता हूं और जिसे मैं उम्मीद करता हूं कि मैं कभी नहीं छोडूंगा और मैं इस सदन से, यथासंभव जोर से, यह कहता हूं कि जब भी इस देश के और अछूतों के हितों में टकराव होगा, जहां तक मेरा संबंध है, अछूतों के हितों को देश के हितों के ऊपर स्थान मिलेगा। केवल इसलिए मैं अत्याचारी बहुसंख्यकों का समर्थन नहीं करूंगा कि ये देश के नाम पर बोलते हैं, मैं किसी पार्टी का समर्थन इसलिए नहीं करने जा रहा क्योंकि यह देश के नाम पर बोलती है। मैं ऐसा नहीं करूंगा। यहां के और हर जगह के लोग समझ लें कि यही मेरा दृष्टिकोण है। देश और मेरे बीच में देश का स्थान ऊपर रहेगा, देश और दलित वर्ग के बीच दलित वर्ग का स्थान ऊपर रहेगा, देश का स्थान ऊपर नहीं रहेगा। अपने इन दो संशोधनों के संबंध में मैं इतना ही कहूंगा।
अब, दूसरे संशोधनों के संबंध में मैं सदन का और समय नहीं लेना चाहता। मैं माननीय प्रधानमंत्री की उस टिप्पणी से थोड़ा आश्चर्यचकित हुआ, जो उन्होंने उस संकल्प के एक हिस्से के संबंध में की थी, जो कहता है कि जो भी व्यवस्था हो, वह प्रांतीय सरकारों की राय से होनी चाहिए। मैं जानता था कि वे मेरे माननीय मित्र मि. मुकादम के द्वारा पेश किए जा रहे संशोधन से परिचित नहीं हैं, क्योंकि मैं देख रहा हूं कि उन हिस्सों को निकाल दिया जाना है। इसलिए, मैं संकल्प के उस हिस्से पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा, यद्यपि मैं यह जरूर कहूंगा कि सिद्धांततः मैं संकल्प के इस हिस्से से सहमत नहीं हूं।
* बोंबे लेजिस्लेटिव असेम्बली डिबेट्स, खंड 7, पृ. 2130, 27 अक्तूबर 1939