24. युद्ध में भागीदारी परिशिष्ट - Page 299

282 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

अब, बैठने से पहले सदन के समक्ष रखे गए दूसरे संशोधनों के संबंध में मैं एक या दो शब्द कहना पसंद करूंगा। ऐसा करने में, माननीय सदस्य विपक्ष के नेता द्वारा प्रस्तुत किए गए संशोधन की ओर ध्यान दिलाऊंगा। इस संशोधन के संबंध में मैं माननीय प्रधानमंत्री से एक बात नोट करने के लिए कहूंगा, जो मैं समझता हूं कि वह नोट करना भूल गए हैं। यह सच है कि अपने संशोधन में विपक्ष के नेता कहते हैं कि लोकतंत्र असफल हो गया। लेकिन, विपक्ष के नेता के संशोधन पर टिप्पणी करते हुए जो बात मैं चाहता हूं कि वह नोट करें, वह यह है। अब हम देखते हैं कि वह लोकतंत्र के खिलाफ हैं, लेकिन वह स्वशासन के खिलाफ नहीं हो सकते। अंततः लोकतंत्र, तानाशाही, गणतंत्रवाद ये सभी सरकार के रूप हैं। वे सभी स्वशासन के अंतर्गत आते हैं। जब तक कि माननीय सदस्य विपक्ष के नेता यह दृष्टिकोण नहीं अपनाते कि यह देश स्वशासन के उपयुक्त नहीं है, तब तक मैं समझता हूं कि उस दुर्भाग्यपूर्ण भाषा पर ज्यादा दोषारोपण नहीं करना चाहिए, जिसका उपयोग किया गया है। अंततः वे हमारे साथ हैं।

और मैं अपने माननीय मित्र प्रधानमंत्री का जोर देकर यह कहना नहीं समझ पाया कि लोकतंत्र ही समस्या का एकमात्र हल है। त्रिपुरी कांग्रेस में माननीय प्रधानमंत्री के मित्रों के भाषणों की सामग्री को मैं याद करता हूं। दुर्भाग्यवश, मेरे पास जो पुस्तक है, मैं उसे आज लाना भूल गया और यह अच्छा हुआ, क्योंकि मेरा समय बच गया। किंतु मैं समझता हूं कि त्रिपुरी कांग्रेस में माननीय प्रधानमंत्री के दोस्त, पंडित गोविंद वल्लभ पंत, मि. राजगोपालचारी, पंडित जवाहर लाल नेहरू और वे सभी मुसोलिनी और हिटलर के गुण गा रहे थे।

माननीय मोरारजी आर. देसाई : कब?

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : यदि जरूरत हो, तो मैं अध्याय और उस अंश का उल्लेख करने को तैयार हूं। वास्तव में मैं किताब लाना चाहता था किंतु इसे लाना भूल गया।

माननीय श्री बी.जी. खेर : मैं वहां मौजूद था, और मैंने भाषण सुना। जो माननीय सदस्य कह रहे थे वह ठीक नहीं है।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : मुझे अफसोस है, मैं पुस्तक अपने साथ नहीं लाया। अगर मेरे पास होती, तो हमने मामले का निर्णय अभी कर लिया होता।

माननीय अध्यक्ष : इसके लिए अब समय नहीं है।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : जो कुछ मैं कहना चाह रहा हूं, वह यह है कि जब तक भारत के लोगों के पास स्वशासन है, चाहे वह लोकतंत्र का रूप ले ले, चाहे वह तानाशाही का रूप ले ले, या चाहे वह कोई दूसरा रूप ले ले, यह विस्तार में जाने का मामला है, जिसके बारे में कोई झगड़ा होना चाहिए। इसलिए मेरा निवेदन यह है कि उस संकल्प पर विचार करते समय, जो, जैसा कि मैंने कहा, किसी सीमा तक दुर्भाग्यवश उचित