बजट पर चर्चा
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तो इस सदन को न केवल मौलिक कानून की, बल्कि नियमों की भी समीक्षा करने का अधिकार है। मेरी समझ में यह नहीं आता कि कोई सरकार यह अधिकार कैसे हथिया सकती है? लेकिन कांग्रेस सरकार ने ऐसा किया है। समय-असमय इसने सदन के इस विशेषाधिकार का अतिक्रमण किया है। रुपए का निकालना, खाली चैक की मांग करना, मैं सदन के विशेषाधिकारों का एक और अतिक्रमण मानता हूं।
महोदय! मैं नहीं जानता कि अब क्या परिस्थितियां हैं, परन्तु हस्तांतरित नियम कहे जाने वाले पुराने भारत सरकार अधिनियम के अंतर्गत बनाए गए नियमों से मैं भली-भांति अवगत हूं। माननीय वित्त मंत्री मेरी बात की पुष्टि करेंगे कि हस्तांतरणीय नियमों के एक भाग में, वित्त विभाग का जिसे संविधान कहते हैं, शामिल था। पुराने भारत सरकार अधिनियम के अंतर्गत मान्यता प्राप्त यह एक आधारभूत सिद्धांत था कि वित्त विभाग हस्तांतरणीय विभाग नहीं होना चाहिए। वित्त विभाग को हस्तांतरणीय विभाग न मानने के लिए अत्यधिक ठोस कारण दिया गया था। वित्त विभाग का उद्देश्य पहरेदार की भूमिका निभाना था। किसी भी मंत्री द्वारा अपने अधीन विभाग के लिए प्रस्तुत की गई खर्चे की मांग की जांच करना वित्त विभाग का काम है। वित्त विभाग के प्रमुख कार्यों में से एक कार्य केवल यह देखना ही नहीं था कि किसी मंत्रालय ने किसी
खास मकसद से जो धन मांगा है, क्या वह जरूरी है और क्या प्रेसिडेंसी की वित्तीय परिस्थितियों में उसे स्वीकार किया जा सकता है, बल्कि उसे यह भी देखना होता है कि क्या अनुदान मांग को मदों के अनुसार अलग-अलग मद में रखा गया है।
मुझे विश्वास है कि हालांकि 1919 का भारत सरकार अधिनियम निरस्त हो गया है और उस अधिनियम के अंतर्गत जो हस्तांतरणीय नियम बनाए गए थे, उनकी भी अब कोई कानूनी हैसियत नहीं है, परंतु उन हस्तांतरणीय नियमों में जो सिद्धांत रखे गए थे, वे तो स्थायी होने चाहिए और उनका सदा पालन होना चाहिए। जब से विधान मंडल द्वारा कार्यपालिका पर नजर रखने के उद्देश्य से स्थापित किए गए वित्त विभाग को नियंत्रण रखने वाली मशीनरी के एक महत्त्वपूर्ण भाग के रूप में मान्यता दी गई है, तब से सदा इस बात को स्वीकार किया गया है कि कोई मंत्री विधान मंडल के समक्ष एकमुश्त राशि की मांग प्रस्तुत नहीं करेगा, जब तक वह उन सेवा विशेष मदों का खुलासा न करें, जिन्हें मांग में शामिल किया गया है। इसके दो कारण हैं। एक तो सदन को ब्यौरेवार यह पता होना चाहिए कि किस मद पर रुपया खर्च किया जा रहा है। दूसरे, परीक्षण लेखा विभाग के लिए यह जानना आवश्यक है कि सदन द्वारा स्वीकृत धन राशि किस प्रकार खर्च हुई है। महोदय! मेरा कहना है कि यह अक्षम्य है कि सरकार सदन के समक्ष केवल इतना कहने का दुस्साहस करे कि उसे अमुक मद पर खर्च करने के लिए 31 लाख रुपया चाहिए, जिसके औचित्य के संबंध में सदन ने कभी भी कोई निर्णय नहीं किया है और ब्यौरेवार इस धन राशि को कैसे खर्च किया जाए, उस संबंध में सरकार ने स्वयं कोई निर्णय नहीं लिया है। मैं इसे दुस्साहस ही कहूंगा।