24. युद्ध में भागीदारी परिशिष्ट - Page 301

284 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

लंबे भाषण में उन्होंने इसका कहीं उल्लेख नहीं किया है। जैसे कि अन्य वक्ताओं ने भी वर्णन किया है कि चाहे वह संगमनेर का फैसला हो या यहां पढ़े गए एक सौ एक मामले का। उसके सुधार का एकमात्र उपाय यह है कि हमारे यहां एक सही ढंग की सरकार होनी चाहिए और वह केवल लोकतंत्र हो सकता है, जिसमें अल्पमत लोगों के लिए पर्याप्त रक्षोपाय किए जाएं। इस तथ्य को हम स्वीकार भी करते हैं। हम लोग माननीय सदस्य को यह बताने के लिए आभारी हैं कि उन्होंने अलस्टर लोगों की तरह यह नहीं कहा है कि तुम्हारे रक्षोपाय भाड़ में जाएं, मुझे तुम्हारा शासन नहीं चाहिए। मैं इस बात की प्रशंसा करता हूं कि वह वैसे नहीं करने जा रहे थे। लेकिन मैं उनके उस वक्तव्य की प्रशंसा नहीं कर सकता, जो उन्होंने दिया और जिसमें उनको पूरी ईमानदारी से विश्वास है। उन्होंने कहा है : ‘मैं स्वयं और देश के बीच, देश को ही वरीयता दूंगा।’ इस विषय में मैं उनका समर्थन करता हूं और उनके कहे हुए प्रत्येक शब्द को उद्धृत करूंगा। मैं माननीय सदस्य के जीवन एवं जीवन-क्रम से भली-भांति अवगत हूं और मैं कह सकता हूं कि वह पूर्णरूपेण सही हैं। यहां तक कि देश की खातिर वह अपनी व्यक्तिगत उन्नति को सदा ही स्वेच्छा से गौण करते रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि दलित वर्ग और देश के बीच वह दलित वर्ग को ही वरीयता देंगे।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : निश्चित रूप से।

माननीय श्री बी.जी. खेर : उन्होंने कहा है कि वे इससे इंकार नहीं कर रहे हैं। मेरा मतभेद उनके उस बयान से है। क्योंकि अंश कभी भी संपूर्ण से बड़ा नहीं हो सकता है। संपूर्ण को ही अंश को अपने में समाविष्ट करना चाहिए।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : मैं संपूर्ण का अंश नहीं हूं। मैं इससे अलग हूं।

* यह श्री पी.जे. रोहम द्वारा दिया गया भाषण है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि यह भाषण सभी प्रकार से डॉ. अम्बेडकर द्वारा अपने भाषण के लिए तैयार किए गए मुद्दों पर आधारित है और डॉ. अम्बेडकर ही इस भाषण के जन्मदाता हैं। श्री रोहम यह भी कहते हैं कि डॉ. अम्बेडकर ने उस भाषण को पुनः प्रस्तुत करने के लिए उन्हें बधाई दी, जिसे उन्होंने सदन में देने के लिए सोचा था किंतु उस दिन यानी 10 नवंबर 1938 को सदन में अनुपस्थित होने के कारण नहीं दे सके थे। बोंबे लेजिस्लेटिव असेम्बली डिबेट्स, खंड 4 (भाग 3), पृ. 4024-38, 10 नवंबर 1938