286 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
स्वास्थ्य को सुधारा जा सकेगा; अत्यधिक निर्धनता के कारण लोगों द्वारा किए जाने वाले अपराधों में कमी आएगी और साथ ही इससे आध्यात्मिक उन्नति के समस्त अवसर मिलेंगे, जिससे समाज का उत्थान होगा।
वर्तमान जीवन के कठिन संघर्ष में बहुत लोगों का विवाह यथासमय नहीं हो पाता, जिससे वे अनेक प्रकार के रोगों एवं बुरी आदतों के शिकार हो जाते हैं। रोगावस्था में अनेक स्त्रियों का जीवन मृतक समान हो जाता है, अधिक संख्या और जल्दी-जल्दी बच्चे पैदा करने में कुछ तो अपनी जान गंवा बैठती हैं। अनचाही संतानों की रोकथाम के उद्देश्य से गर्भपात के प्रयत्नों ने स्त्रियों की मरने की संख्या अत्यधिक बढ़ा दी है। अनचाही संतानें अपनी माताओं से प्रायः तिरस्कृत रहती हैं। इस कारण वे और कुछ नहीं बल्कि समाज के लिए बोझ बन जाती हैं। आगे चलकर ये रोगग्रस्त लोग सदोष बच्चों को उत्पन्न कर समाज को और भी बदतर स्थिति में पहुंचा देते हैं। जन्म-नियंत्रण एकमात्र उत्तम उपाय है जो इन संकटों को टाल सकता है। जब भी कोई स्त्री, किसी भी कारण से बच्चा पैदा करना नहीं चाहती, उसे गर्भ-निरोध की छूट होनी चाहिए और स्वेच्छा से बच्चा पैदा करने के लिए स्वतंत्र भी होना चाहिए। अनचाही संतानों की वृद्धि से समाज को कोई लाभ नहीं होगा। माता-पिता द्वारा चाहे गए बच्चे ही समाज के लिए हितकर होंगे और इसलिए प्रत्येक स्त्री को आसानी से गर्भ-निरोध की सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
अनैतिकता का मूल कारण गरीबी ही है। वियना 1931 के सम्मेलन में डॉ. टोन्डलर द्वारा पढ़े गए लेख का निम्नलिखित अंश आवास की अपर्याप्तता के दुष्परिणाम को स्पष्ट करेगा। प्रोफेसर ने कहा था :
औसतन प्रत्येक परिवार को जर्मनी में एक, फ्रांस में ढाई और इंग्लैंड में तीन कमरे मिलते हैं। बर्लिन में 1925 में पचहत्तर हजार परिवारों के पास अपने मकान नहीं थे। इसका परिणाम यह है कि बच्चे वयस्कों के साथ न केवल एक ही कमरे में अपितु एक ही बिस्तर पर सोते हैं। बहुत अधिक भीड़ एवं गंदे निवास के कारण बहुत से बच्चों की तो जानें चली जाती हैं। पूरे परिवार यौन रोगों से ग्रस्त हो जाते हैं। लड़कियां परिपक्व होने से पहले ही मैथुन का शिकार हो जाती हैं। माता-पिता और उनके बच्चों के बीच तथा भाई-बहन के बीच भी प्रायः यौन संबंध स्थापित हो जाते हैं। लड़के चोरी करना सीखते हैं और लड़कियां वेश्या बन जाती हैं। यही स्थिति वियना में भी है। 1919 में दिए गए मकानों में से 10 प्रतिशत के पास केवल एक छोटा कमरा, 37 प्रतिशत के पास एक बड़ा कमरा और 23 प्रतिशत के पास एक छोटा तथा एक बड़ा कमरा था। अपने आप ही अपना भरणपोषण स्वयं करने वाले चौदह से अठारह वर्ष के बीच की आयु के बच्चों में से 20 प्रतिशत के पास अपने अलग बिस्तर नहीं थे। गांवों और कस्बों में तो हालत और भी बदतर है।
हमारे देश में, बंबई जैसे महानगरों में भी यही स्थिति है। कुछ अपवादों को