जन्म-नियंत्रण के उपाय पर
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छोड़कर यह देखा गया है कि गरीबी में सारे गुण अवगुण बन जाते हैं। आगे भी यह स्पष्ट किया जाएगा कि बिना जन्म-नियंत्रण की सहायता के गरीबी उन्मूलन प्रायः असंभव है। बुभुक्षितः किम् न करोति पापम् कृ (भूखा क्या न करता) वाली सूक्ति तो सुविख्यात है ही।
इस प्रकार जब हमें स्पष्ट पता चल गया है कि जन्म नियंत्रण ही सब तरह के विकास के लिए अनिवार्य शर्त है, तो हमें उसे प्राप्त करने के साधनों पर भी विचार करना चाहिए। इसे प्राप्त करने का पहला उपाय यह है कि बच्चों की इच्छित संख्या के लिए आवश्यक यौन-सुख से ही लोगों को संतोष कर लेना चाहिए तथा बच्चे की आवश्यकता न रहने पर अपने मन से यौन इच्छाएं निकाल देनी चाहिए। पहले उपाय के लिए यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि अविवाहित अवस्था में ब्रह्मचर्य-पालन संभव हो सकता है, किंतु मानव-स्वभाव से यह आशा करना कि, एक साथ रहने वाले, परस्पर प्रेम करने वाले, युवा और स्वस्थ विवाहित युगल वर्षों तक ब्रह्मचर्य का पालन करें, मूर्खता ही होगी। इसमें संदेह नहीं कि काम-सुखों की उपस्थिति से भी जिनके मन प्रभावित नहीं होते हैं, ऐसे दृढ़ निश्चयी व्यक्तियों को छोड़कर, साधारण मानव इन काम-सुखों के सम्मोहन में पड़कर इनका शिकार अवश्य हो जाएंगे। इसलिए क्या यह आश्चर्यजनक बात नहीं है कि प्रकाश के समान स्पष्ट इस तथ्य का कुछ लोगों ने खंडन किया है।
विभिन्न देश एवं कालों के अनुभव से यह पाया गया है कि जन्म-नियंत्रण के लिए आत्म-संयम सर्वथा अनुपयोगी सिद्ध हुआ है। ब्रह्मचर्य की वकालत करने वाले भी यह दावा नहीं कर सकते हैं कि साधारण आदमी आजीवन पूरी तरह से मैथुन मुक्त रहने में समर्थ हो सकेगा। यदि वर्ष में एक दिन के लिए ब्रह्मचर्य का पालन छोड़ दिया जाए, तो यह वार्षिक गर्भधारण की संख्या को बढ़ाएगा। यदि यह मान भी लें कि आत्म-संयम कुछ लोगों को जन्म-नियंत्रण पर काबू करने योग्य बनाएगी, फिर भी इससे हम यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकते कि अन्य लोग भी उनका अनुसरण करेंगे। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि जैसे विभिन्न व्यक्तियों में भूख की तीव्रता अलग-अलग होती है, उसी तरह प्रत्येक व्यक्ति में काम वासना भी अलग-अलग होती है।
हिंदू धर्म-ग्रंथों में उल्लिखित नियमों का कठोर पालन परिवार नियोजन के आदर्श की अवहेलना करता है। उदाहरण के लिए विष्णु स्मृति का श्लोक 8, अध्याय 54, कुछ विशिष्ट दिनों पर मैथुन करने का आदेश देता है।
महोदय! श्रीमती सरोजिनी मेहता, एम.ए. की लिखी पुस्तिका माननीय सदस्यों को मिल गई है। मैं उसे पूरा नहीं पढ़ूंगा अपितु उसमें से कुछ अंश ही यहां उद्धृत करूंगाः
जब भी जन्म-नियंत्रण विषयक चर्चा चलाई जाती है, तब हमारे विरोधी यह