288 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
राग अलापने लगते हैं कि ब्रह्मचर्य हमारे देश के लिए उत्तम उपाय है और यही अच्छा होगा कि पश्चिम देशों को उनके अपने कृत्रिम उपायों से लाभ उठाने दें। इन माननीय सदस्यों से मैं विनम्रतापूर्वक जानना चाहता हूं कि ये लोग किन आधारों पर ऐसी धारणा रखते हैं। यह कहा गया है कि हमारे देशवासी अध्यात्मवादी हैं, जबकि पश्चिम के लोग भौतिकवादी हैं। तोते की तरह रटी इस बात को सुनते-सुनते अब कान पकने लगे हैं। किस तरह से हमारे देशवासी अध्यात्मवादी हैं? क्या हमारे देशवासी संसार त्यागकर संन्यासी हो गए हैं? क्या मात्र कुछ लोकप्रिय नारे जैसे ‘सब कुछ मिथ्या है, सांसारिक जीवन का मोह त्याग देना चाहिए’, की पुनरावृत्ति लोगों को अध्यात्मवादी बना देगी? क्या हमारे प्रत्येक गांव के गरीब और निर्दोष कर्जदार तथा उनकी खाल उतार लेने वाले शायलॉक (शेक्सपियर का एक धूर्त चरित्र) मौजूद नहीं है? क्या विधवाओं की धरोहर को निगलने वाले साहूकार हमारे यहां नहीं हैं? क्या हम लोगों के बीच ऐसे शैतान नहीं हैं, जिन्होंने विधवाओं को गुमराह कर उन्हें असहाय जीवन जीने को विवश कर दिया है? क्या हम दावा कर सकते हैं कि हमारे समाज में ऐसे लोग नहीं हैं, जिन्होंने अपनी पवित्र और समर्पित पत्नी को घर से निकालकर वेश्यावृत्ति के द्वार तक नहीं पहुंचा दिया है? मैं यह समझने में पूरी तरह से असमर्थ हूं कि वह समाज अध्यात्मवादी कैसे कहा जा सकता, है जिसमें वैवाहिक लेन-देन, जो कि वास्तव में वर-वधुओं का विक्रय है, के कारण ही बहुत लोग बर्बाद हो जाते हैं। इन अवसरों पर कोई व्यक्ति यदि अपनी जाति बिरादरी वालों को भोज नहीं देता, तो उसे जाति से बाहर कर दिया जाता है। पहली पत्नी की चिता जलते समय जहां के लोग दूसरी शादी की योजना बना रहे होते हैं। पैसे के बल पर, जिस समाज में साठ साल का बुड्ढा भी बारह साल की लड़की से शादी कर लेता है और जहां विधवाओं के साथ जानवर से भी बदतर सलूक किया जाता है। अपने समाज की ऊपर बताई गई दुर्दशा के लिए हम पाश्चात्य भौतिकवाद को उत्तरदायी नहीं मान सकते हैं। इसके विपरीत जो पाश्चात्य भौतिकवाद के संपर्क में आए हैं, वे इन बुराइयों को दूर करने का भरपूर प्रयास कर रहे हैं। हालांकि उनके प्रयासों को सफलता नहीं मिली है।
आगे एक अन्य पैरा में वह लिखती हैं :
अहिल्या के प्रति इंद्रराज का, सत्यवती के प्रति पाराशर ऋषि का और कुंती के प्रति सूर्यदेव का आचरण! उनको कलियुग में सख्त से सख्त कारावास की सजा दिलाता किंतु उन्हें सतयुग का विचारते हुए हमने उन कदाचारों को न केवल मौन सहमति दी, अपितु वैसे आख्यानों को लेकर धर्म-ग्रंथ स्तर की पुस्तकें भी रच डालीं और इस बात पर जोर भी दिया कि इन पुस्तकों को बच्चों की पाठ्य पुस्तक के रूप में रखा जाना चाहिए। विद्यार्थी महाभारत, भागवत और पुराणों में