I. जन्म.नियंत्रण के उपाय - Page 306

जन्म-नियंत्रण के उपाय पर

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ब्रह्मचर्य पर कितने पाठ पा सकते हैं? वह काल, जिसे ब्रह्मचर्य के बारे में स्वयं पता नहीं था, हमें उस सद्गुण का पालन करने के लिए कैसे प्रेरित कर सकता है। यह मानना कैसे संभव हो सकता है कि उस समय ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया जाता होगा, जबकि उस दौरान राजा दुष्यंत की कहानी जैसी घटनाएं हुई थीं। पहले ऋषि-आश्रम में रहने वाली निश्छल एवं निर्दोष कन्या को राजा ने बहकाया और जब वह गर्भवती थी, तब उसे निकाल दिया। प्राचीन आख्यानों में वर्णित कुछ लोगों द्वारा उत्पन्न की गई संतानों की संख्या के बारे में जब कोई विचारता है, तो उनके प्रति स्वाभाविक रूप से उसके मन में एक शंका पैदा होती है कि क्या इस समय लोग स्वप्न में भी कभी सोचते थे कि ब्रह्मचर्य क्या है? कोई कैसे विश्वास कर सकता है कि उस समय ब्रह्मचर्य का पालन होता था, जबकि सगर ने साठ हजार पुत्र पैदा किए, कौरव सौ भाई थे और दक्ष प्रजापति की सत्ताइस कन्याएं थीं, तथा इस तरह के अन्य अनेक उदाहरण हैं। उस समय ब्रह्मचर्य के प्रति श्रद्धा कम थी। वास्तव में उन दिनों लोग इस संबंध में सोचते ही नहीं थे। किसी भी भौतिकवादी देश से हमारे देश की जन्म-दर कम नहीं हो रही है। तब भी ब्रह्मचर्य का पालन नहीं होता है, जब पहले से ही कई बच्चों की मां के प्राण पुनः दूसरे प्रसव से खतरे में पड़ गए हों। इसका पालन भूखों मरने वाले कंगालों के परिवार में भी नहीं किया जाता है, जहां परिवार में एक भी नए सदस्य का आना किसी भारी विपत्ति से कम नहीं है। इस बेरोजगारी के समय में भी जब कि पुत्रों के मकान की व्यवस्था व्यावहारिक रूप से असंभव है, मध्यवर्गीय परिवारों में प्रत्येक वर्ष या डेढ़ वर्ष में अतिरिक्त बच्चे पैदा होते रहते हैं। जिन जातियों में दहेज प्रथा प्रचलित है, उनमें पुत्री का जन्म होने पर माता-पिता पर दुख का आसमान टूट पड़ता है। वे पुत्री को या तो प्रारंभ में ही मार देते हैं या इतने तिरस्कृत रूप से उसका पालन-पोषण करते हैं कि उसकी स्वाभाविक मृत्यु हो जाती है। इन सब घटनाओं के बावजूद वे लड़की उत्पन्न होने की संभावना को टालने के लिए भी ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करते हैं। इन सब घटनाओं के बावजूद हम यह घोषणा करते हैं कि मात्र ब्रह्मचर्य ही हमारे देश के लिए आदर्श है। ऐसे आचरण का सांसारिक उपयोग क्या है? वास्तव में हमें यथार्थ स्थिति को ही ध्यान में रखना चाहिए। क्या है? केवल आदर्शों की बात करने से हमारी स्थिति में कोई सुधार होने वाला नहीं है। डॉ. के. बी. अंत्रोलीकरः महोदय! इसे पढ़ा हुआ मान लिया जाए क्योंकि सभी सदस्यों ने इसे प्राप्त कर लिया है।

श्री पी. जे. रोहम : महोदय! मैं यह स्पष्ट कर चुका हूं कि मैं इसे पूरा नहीं पढ़ रहा हूं। मैं अपने माननीय मित्र डॉ. अंत्रोलीकर से निवेदन करता हूं कि वह कृपया धीरज रखें। वह आगे कहती हैं :