290 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
इसलिए, यदि उनके हृदय में देश-कल्याण की भावना हो, तो उन्हें यथासंभव
ब्रह्मचर्य को लोकप्रिय बनाने का प्रयास करना चाहिए। इस कार्य को क्रमबद्ध
ढंग से करने के लिए वे संस्थाओं का निर्माण भी करें। वे सब कार्य उन्हें वैसे
ही करने हैं, जैसे जन्म-नियंत्रक अपने गर्भ-निरोधकों की लोकप्रियता के लिए
कर रहे हैं। यदि वे इस विषय में कुछ करने में असमर्थ या अनिच्छुक हैं तो
इससे गर्भ-निरोधकों के हिमायतियों के हाथ ही मजबूत होंगे।
जैसा कि एक चिकित्सक ने बड़ी विवेकपूर्ण टिप्पणी की है कि औरतों के प्रसव के दौरान होने वाली पीड़ाओं को यदि पुरुषों को सहना पड़े, तो कोई भी पुरुष एक से अधिक बच्चा पैदा करने के लिए कभी भी तैयार नहीं होगा।
यह मानना गलत है कि अब तक समाज के सामने बड़े परिवार का आदर्श है इसलिए कोई भी अपने परिवार को सीमित करना नहीं चाहता है। ऐसे लोग विरले ही हैं, जो गंभीरतापूर्वक बड़े परिवार की जिम्मेदारी लेना पसंद करते हों। साधारण आदमी अपना परिवार छोटा रखना चाहते हैं और वे गर्भपात, शिशु-हत्या आदि क्रूर विधियों का सहारा लेने से भी झिझकते नहीं हैं। 1934 में पीपुल्स ट्रिब्यून में छपे एक विवरण के अनुसार 1933 में केवल शंघाई की गलियों से ही 24,000 शिशुओं के शव प्राप्त किए गए और यही स्थिति प्रायः पूरे चीन की है। दुखद एवं भयानक गरीबी के कारण ही माता-पिता अपने बच्चां को बेसहारा छोड़ देते हैं। ऐसे उदाहरणों के रहते यह आशा करना व्यर्थ है कि मात्र आत्मसंयम के द्वारा साधारण आदमी संतानोत्पत्ति से बचने के प्रयास में समर्थ हो सकेगा। इसलिए, यह सिद्ध हो जाता है कि आधुनिक गर्भ-निरोधकों के सिवाय और कोई उपाय नहीं है। इन उपायों की अनिवार्यता को अस्वीकार करना गर्भपात, शिशु-हत्या इत्यादि के प्रति वरीयता दिखाना ही होगा।
कुछ लोग समझते हैं कि यदि उनकी किसी विशेष जाति, धर्म या क्षेत्र के लोगों की संख्या कम होती है, तो उन्हें हानि होगी। इससे उनमें यह भय भी बना हुआ है कि ऐसा होने पर उनके विरोधी उन पर हावी हो जाएंगे। इस संबंध में सबसे पहले यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ज्यों ही परिवार सीमित किया जाएगा, त्यों ही जनसंख्या वृद्धि की दर अनिवार्य रूप से कम नहीं हो जाएगी। वह दर मुख्यतः जीवित रहने की दर पर निर्भर है न कि मात्र जन्म-दर पर। अनेक वैज्ञानिकों के विभिन्न स्थानों से प्राप्त अनुभव ने यह प्रमाणित कर दिया है कि यदि जन्म-दर अधिक होती है तो मृत्यु-दर भी अधिक होगी और जैसे-जैसे जन्म-दर में कमी आती है वैसे ही मृत्यु-दर भी घटती है। परिणाम यह है कि इससे न केवल जीवित रहने की दर पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है बल्कि इसे बढ़ाता भी है। ‘द मदर्ज़ क्लीनिक’ से प्राप्त अनुभवों में डॉ. मारिया स्टोप्स ने पाया है कि गर्भधारण की संख्या जितनी अधिक होगी, उसी अनुपात में माता एवं शिशुओं की मृत्यु-दर भी बढ़ेगी। ऐसा ही