I. जन्म.नियंत्रण के उपाय - Page 311

294 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

गर्भ निरोधक की जानकारी उनको दी जाती है, इसका भरपूर लाभ उठाते हैं क्योंकि उनके लिए इसकी आवश्यकता अधिक होती है। हमारे देश की अधिकांश जनता हालांकि अशिक्षित है, फिर भी वे अपने हित की बात अच्छी तरह समझती है। इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं है कि ज्यों ही उन्हें इस नए अविष्कार की जानकारी दी जाएगी, वे इसका पूरी तरह से उपयोग करेंगे। ऐसे लोगों के लिए नसबंदी उपयोगी होगी। इसलिए सरकार और नगर निगम को अपने-अपने अस्पतालों में तत्संबंधी सुविधाएं प्रदान करनी चाहिए।

स्वर्गीय प्रधानाचार्य गोले ने अपनी मराठी पुस्तक हिंदू धर्म आणि सुधारणां में साफ-साफ लिखा है कि ग्रामीणों में भी बहुत सारे सद्गुण हैं और वास्तव में ये ही लोग अच्छे नागरिक उपलब्ध कराते हैं।

इस आंदोलन के विरोधियों ने इसकी निस्सारता दिखाने का प्रयास फ्रांस, जर्मनी और इटली का उदाहरण देकर किया है, लेकिन वे भूल गए कि हम उन देशों का तब तक अनुसरण नहीं कर सकते हैं, जब तक यह न सिद्ध हो जाए कि अपनी जनसंख्या वृद्धि करने का उनका प्रयास न्यायसंगत है। सर्वप्रथम हमें ध्यान में रखना चाहिए कि हमारे देश की अपेक्षा इन देशों की जन्म-दर बहुत कम है। हमारी जन्म-दर 35 है, जबकि 1936 में इटली, फ्रांस और जर्मनी की जन्म-दर क्रमशः 22.2, 15 और 19 थी। जर्मनी की जन्म-दर 1900 में 35.6 थी, लेकिन 1933 में यह घटकर 14.7 हो गई। उसके पश्चात् इटली और फ्रांस ने भी अपनी जन्म-दर बहुत कम कर दी थी। 1851-55 में इंग्लैंड की जन्म-दर 33.9 थी, लेकिन 1931 तक उसको घटाकर 15.3 कर दिया था। हमारे देश की जन्म-दर विगत 50 साल से व्यावहारिक रूप से स्थिर है इसलिए उसे बढ़ाने के लिए दूसरे देशों के प्रयास की नकल करना हमारे लिए अनुचित होगा।

अपनी जाति के लोगों की वृद्धि दर में कमी के लिए साम्राज्यवादियों का दुखी होना नितांत स्वाभाविक है। इसी कारण यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि वे ‘सर्जन करो या मरो’ जैसे नारे लगाएं। तथापि यह आश्चर्यजनक है कि इन नारों ने कुछ शिक्षित लोगों में भी जन्म-नियंत्रण के लाभ के बारे में संदेह उत्पन्न कर दिया है। इस विषय को, फरवरी 1938 के द नाइन्टीन्थ सेन्चुरी एंड आफ्टर में छपी सर लियो शियोजा मनी का आलेख ‘रिन्यू ऑर डाई’ (सर्जन करो या मरो) स्पष्ट करता है। इस लेखक ने यह मान लिया है कि संपूर्ण मानवता की भलाई के लिए गोरों का नेतृत्व आवश्यक है और इसलिए उसने गोरों की घट रही संख्या को रोकने के लिए आवाज उठाई है। पहले तो बहुत से लोग यह मानने को तैयार ही नहीं होंगे कि गोरों के प्रभुत्व ने विश्व को लाभान्वित किया है। दूसरे, शिक्षित लोग इस दावे को किसी तरह मानने को तैयार नहीं होंगे कि गोरों की संख्या में कमी से मानवता पर कोई विपत्ति आएगी। इसके अलावा इस व्यक्ति की सारी अभिधारणाएं भी गलत