जन्म-नियंत्रण के उपाय पर
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हैं। उसने इसे मान लिया है कि इंग्लैंड में जन्म-दर धीरे-धीरे कम होती जाएगी तथा 2035 में इसकी जनसंख्या घटकर 44 लाख रह जाएगी। परंतु वास्तविकता यह है कि इंग्लैंड में जन्म-दर घटने के बजाए बढ़ रही है। सन् 1933 में यह 14.4 थी लेकिन जुलाई 1938 में यह 15.3 हो गई। इस प्रकार लेखक ने जहां अनुमान लगाया है कि इंग्लैंड और वेल्स की जनसंख्या 1940 में केवल 4,0700,000 होगी, जब कि इसकी वास्तविक संख्या 1937 में भी 410,31,000 थी और यह 1,90,000 व्यक्ति प्रतिवर्ष की दर से, बढ़ भी रही है। ये तथ्य दिखाएंगे कि ऐसे आलेखों से गुमराह होने से बचने के लिए लोगों को सचेत रहना चाहिए।
कभी-कभी उत्प्रवासन को अत्यधिक जनसंख्या से मुक्ति पाने के उपाय के रूप में सुझाया जाता है लेकिन यह उपाय भी बहुत आशाजनक नहीं है। किसी को भी उत्प्रवास के लिए विवश करना उसे निर्वासित करने के बराबर है, इसलिए इस उपाय पर ध्यान देने का प्रश्न ही नहीं उठता। बहुत कम लोगों में अपना देश, जो देश अपने बचपन की यादों से, अपने मित्र तथा सगे-संबंधियों की उपस्थिति से, अनुरूप जलवायु और कारणों से प्रिय बन गया है, उसे छोड़कर दूसरे देश में जाने के लिए, जिसकी जलवायु अनुरूप न होने का भय है और जहां के निवासियों की भाषा, आचरण और रीति-रिवाज भी भिन्न है। प्रायः जो लोग दूसरे देश में उत्प्रवास करना चाहते हैं, वे समर्थ, कर्मठ एवं अच्छे नागरिक होने के लायक होते हैं। ऐसे लोगों का देश छोड़कर जाना वास्तव में मातृभूमि के लिए हानिप्रद है। ये लोग अपने देश में भी आसानी से अपना भरण-पोषण कर सकते हैं किंतु उनकी महत्त्वाकांक्षा उन्हें दूर देश में जाकर अपना भाग्य अच्छा करने के लिए उकसाती है। शारीरिक, मानसिक या आर्थिक रूप से विकलांग लोगों के लिए उत्प्रवासन व्यावहारिक दृष्टि से बेकार है और इन लोगों को सहायता की आवश्यकता है। केवल आवश्यक पूंजी की दृष्टि से विचार करने पर भी यह उपाय बहुतों को राहत नहीं दे सकता है।
इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि कम आबादी वाले देश भी दूसरों को समायोजित करने के इच्छुक नहीं होते है, क्योंकि उन्हें अपनी बढ़ती जनसंख्या के लिए विस्तृत जगह की आवश्यकता होती है। कनाडा, ब्रिटिश साम्राज्य का एक उपनिवेश है, जहां के निवासी मुख्य रूप से अंग्रेज ही हैं किंतु वे इसके लिए बदनाम हैं कि उन्होंने वहां सामयिक कार्य करने गए इंग्लैंड के मजदूरों को भी अपने देश में बसने से मना कर दिया। युद्ध तो घनी आबादी वाले देशों के कम आबादी वाले देशों में प्रवेश करने के प्रयासों से आरंभ होते हैं। बर्मा की घटना, जो हाल ही में और हमारे पड़ोस में घटी है, इसका उपयुक्त उदाहरण है। वहां के हाल के सांप्रदायिक दंगों का मूल कारण बर्मावासियों का यह भ्रम है कि भारतीयों ने उनके भौतिक विकास में बाधा डाली है। घनी आबादी वाले देशों के तुलना में कम आबादी वाले देश बहुत ही कम हैं। जापान, इटली, जर्मनी, चीन एवं भारत सहित