जन्म-नियंत्रण के उपाय पर 297
हमारी आबादी बहुत अधिक है और इसकी वृद्धि अवांछनीय है, इसे उच्च दर पर
बढ़ाने का प्रयास आत्मघाती होगा। लड़कियों के विवाह की उम्र बढ़ाने के प्रयास
के साथ ही हमें जन्म-नियंत्रण का भी एक व्यापक अभियान चलाना चाहिए।
इसके अतिरिक्त यह भी नहीं भूलना चाहिए कि उचित आयु में विवाह नहीं किए जाने वाले लोगों द्वारा ही वेश्यावृत्ति को बढ़ावा मिलता है और इसके अन्य दुष्परिणाम भी निकलते हैं। इसलिए, यदि हमारा लक्ष्य उचित आयु पर विवाह है, तो हमारे लिए जन्म-नियंत्रण का सहारा लेना आवश्यक है।
यह दृष्टिकोण कि स्त्रियों की आर्थिक स्वतंत्रता जनसंख्या-वृद्धि को कम करेगी, भी तर्कसंगत नहीं है। आर्थिक स्वतंत्रता में भी किसी व्यक्ति को वासना के चंगुल से छुड़ाने का सामर्थ्य नहीं है। कुछ ही स्त्रियां आजीवन पूरी तरह से ब्रह्मचर्य पालन कर सकती हैं इसलिए यह उपाय भी निष्फल प्रतीत होता है। अभी भी निम्नवर्ग की स्त्रियां अपनी आय से अपने परिवार की वास्तविक सहायता कर रही हैं, किंतु इससे ऐसा नहीं लगता कि उनको परिवार सीमित करने में कोई सहायता मिली है।
कुछ लोगों का विचार है कि यद्यपि जन्म-नियंत्रण चिकित्सा और स्वास्थ्य के आधारों पर अनिवार्य हो सकता है पर आर्थिक समस्याओं के समाधान हेतु यह आवश्यक नहीं है। वे कहते हैं कि हमारे देश में आर्थिक और कृषि संबंधी विकास की बहुत संभावना है और इस दिशा में किए जाने वाले प्रयास हमारे देश की जनता के जीवन-स्तर को पर्याप्त रूप में सुधारेंगे। किंतु ध्यान से परखने पर यह दृष्टिकोण भी तर्कसंगत नहीं पाया गया है। पर्याप्त पूंजी और धनी ग्राहकों की कमी हमारे उद्योगों के किसी भी प्रकार के महत्वपूर्ण विकास में बाधा डालेगी। उसी प्रकार, उपजाऊ भूमि, वर्षा और उर्वरकों की कमी हमारे कृषि-उत्पादन की किसी भी वास्तविक वृद्धि के मार्ग में बाधा डालती है। असम के सिवाय ऐसी बहुत कम उपजाऊ भूमि है, जिसका कृषि के लिए अभी तक उपयोग न किया गया हो। बर्मा में अब भी पर्याप्त भूमि पर
खेती नहीं की गई है और उस प्रांत की ऐसी भूमि के आंकड़े ने बहुतों को इस भ्रम में डाल दिया है कि भारत में अब भी पर्याप्त अनजोती उपजाऊ भूमि है। हमारे प्रांत में 86.4 प्रतिशत भूमि को कृषि योग्य बना लिया गया है और यह संदेहास्पद है कि क्या शेष भूमि का एक छोटा टुकड़ा भी किसी महत्व का है। भारतीय कृषि पर रायल कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार इस प्रकार की काफी भूमि बेकार है। हमारे देश में कृषि योग्य भूमि का एक बड़ा भाग पर्याप्त उर्वरक के अभाव और निरंतर फसल उगाने से बंजर हो गया है।
जनसंख्या की अत्यधिक वृद्धि के कारण हमारे देश में वनों एवं चरागाहों की कमी हो गई है। कनाडा में 34.3 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि चरागाह के लिए सुरक्षित है। इसका अनुपात फ्रांस में 21.5, इटली में 18.3, जर्मनी में 14.3 किंतु हमारे देश में केवल 1.6 है। ये आंकड़े स्पष्ट करेंगे कि हमारे पशुओं की हालत कितनी खराब