298 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
है। जहां भी दृष्टि डालें हमें पशु कंकाल रूप में ही दिखाई देते हैं। यद्यपि हमारे देशवासी अपने मानवतावाद पर गर्व करते हैं, पर उन्होंने भूमि के लिए अपने संघर्ष में मूक प्राणियों को अन्यायपूर्वक उनके चरागाह से वंचित कर अधिकाधिक भूमि कृषि-कार्य के लिए ले ली है। इसलिए हमारी कृषि को उपयोगी पशुओं एवं गोबर जैसे प्राकृतिक खाद आदि के अभाव में नुकसान हो रहा है, अतः इसमें पर्याप्त सुधार ला पाना बहुत कठिन है। कुछ लोग जापान और चीन में प्रति एकड़ बृहत पैमाने पर उत्पादित चावल की बात करते हैं और यह आशा करते हैं कि हमारे यहां भी महत्वपूर्ण रूप से इस फसल की पैदावार बढ़ाई जा सकती है। तथापि उन देशों में उत्पादित चावल के आंकड़ों की सच्चाई संदेहास्पद है। इटली के भूतपूर्व विदेश मंत्री काउंट कारलो स्फोरा का ‘द कॉनफ्लिक्ट बिटवीन चाइना एंड जापान’ विषयक आलेख न्यूयार्क से प्रकाशित होने वाली मासिक इंटरनेशनल कानसीलिएशन के हाल ही के अंक में छपा है। इसमें उल्लेख है कि सन् 1900 से जापान में प्रति एकड़ चावल उत्पादन में भारी कमी हुई है। ऐसे बहुत से साक्ष्य हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि कृषि संबंधी जापान के आंकड़े विश्वसनीय नहीं हैं। इसके अतिरिक्त इस तथ्य को भी स्वीकार करना चाहिए कि जापान को समयानुसार एवं वर्ष भर वर्षा तथा सुविस्तृत वनों की प्राकृतिक देन है। उसके कारण उसको उपयुक्त जलवायु भी प्राप्त है। इस तरह की समस्त सुविधाओं का संयोग एक ही स्थान पर शायद ही कहीं देखा जा सकता है। यद्यपि यह भी स्वीकार किया जा सकता है कि स्वशासन हमारी जनता की उन्नति को कुछ प्रभावित कर सकता है, पर हम लोगों की आर्थिक स्थिति में किसी भी स्थायी और पर्याप्त सुधार की आशा तब तक नहीं कर सकते जब तक जनसंख्या वृद्धि को सोच-समझकर नियंत्रित नहीं किया जाता है। जैसा कि पहले बताया गया है, जनसंख्या अवसर का लाभ उठा कर तेजी से बढ़ने लगती है और इस प्रकार यह विशेष प्रयासों से अर्जित सभी लाभों को व्यर्थ कर देती है। वैज्ञानिकों के इस प्रकार के अनुभवों ने यह सोचने के लिए विवश किया है कि जब तक जन्म-नियंत्रण के द्वारा जनसंख्या को सीमित करने के उपायों के साथ-साथ आर्थिक स्थिति सुधारने के प्रयास नहीं किए जाते हैं, तब तक लोगों के जीवन-स्तर में कोई स्थायी और वास्तविक उन्नति नहीं हो सकता है।
लोगों की स्थिति में बहुमुखी सुधार लाने के लिए मात्र स्वराज्य सामर्थ्यहीन है, इस तथ्य को अनेक स्वतंत्र देशों के उदाहरणों ने पूरी तरह सिद्ध कर दिया है। यद्यपि निम्न जन्म-दर सहित अनेक कारणों से हमारे देशवासियों की अपेक्षा अमरीका और इंग्लैंड जैसे देशों के निवासियों की आर्थिक दशा बहुत अच्छी है और हमारे बहुत से देशवासियों को गरीबी के कारण पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता है, फिर भी इसे संतोषजनक नहीं कहा जा सकता है। यहां तक कि वहां भी आदर्श स्वास्थ्य के लिए आवश्यक जीवन स्तर बनाए रखने में बहुतों को परेशानी होती है। राष्ट्रपति