बजट पर चर्चा
सिवाए वह कर ही क्या सकते हैं? वह कुछ और नहीं कर सकते (ठहाका)।
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एक माननीय सदस्य : क्या वह रोएं-चीखें?
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : मैं चाहता हूं कि वह रोएं और मैं उन्हें रोते-चीखते देखना चाहता हूं, क्योंकि इससे कुछ अहसास होगा कि उनमें भावनाएं हैं, हमदर्दी है। हंसने से कोई लाभ नहीं और इसमें कोई तुक भी नहीं है।
महोदय! अब मैं सवाल के दूसरे पहलू पर आता हूं। सरकार ने इस बजट में खर्च की जो व्यवस्था की है, क्या वह स्थायी रहेगी? शिक्षा पर सरकार ने जो 29 लाख रुपए
खर्च करने का प्रस्ताव किया है, क्या वह रकम अगले वर्ष और उससे अगले वर्षों में भी जारी रहेगी? लघु सिंचाई योजनाओं के लिए और दूसरी चीजों के लिए सरकार ने जो व्यवस्था की है, क्या उम्मीद की जा सकती है कि अगले साल और उससे अगले साल भी इन सब मदों के लिए धन मिलता रहेगा? क्या हम इस बात पर विश्वास कर सकते हैं कि ये स्थायी मदें होंगी? महोदय! मैं कोई सकारात्मक जवाब नहीं दे सकता। परंतु हम सबको स्पष्ट हो जाएगा यदि हम एक सवाल पूछें और वह यह है कि सरकार ने इस खर्च का क्या प्रबंध किया है? इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कौन से स्रोत हैं? मैं देखता हूं कि बजट तैयार करते समय वित्त मंत्री का ध्यान 10,50,000 रुपए पर था, जो वर्तमान वर्ष के खर्च से बचे हुए हैं। तत्पश्चात् उन्होंने इस साल की शेष राशि में से 63 लाख रुपए निकाल लिए हैं। तीसरे, उन्हें कुछ नए करों से 8 लाख रुपए की अतिरिक्त आय होने की उम्मीद है। यह साधन हैं, जिन पर मेरे माननीय मित्र नई मदों पर खर्च का प्रबंध करने के लिए निर्भर करते हैं। लेकिन, महोदय! मेरा सवाल यह है कि मेरे मित्र माननीय वित्त मंत्री द्वारा सुझाए गए क्या यह साधन और उपाय स्थायी और आगे तक चलने वाले हैं? क्या इन पर साल-दर-साल भरोसा रख सकते हैं? हम आंकड़ों का विश्लेषण करें। पहली बात तो यह है कि चालू वर्ष के राजस्व में बढ़ोतरी से जो उन्हें 10,50,000 रुपए प्राप्त हुए हैं, उसका मुख्य कारण है कि सौभाग्य से वह उत्पाद शुल्क और स्टाम्प जैसे दो स्रोतों से अतिरिक्त राजस्व प्राप्त करने में समर्थ रहे हैं। उनके अपने आंकड़ों के अनुसार राजस्व के इन दोनों स्रोतों से उन्हें 21,52,000 रुपए प्राप्त हुए हैं। फिर, भारत सरकार ने उन्हें आयकर के खाते से 27 लाख रुपए दिए हैं। अब उनके अपने सिद्धांत के अनुसार नशाबंदी या उत्पाद शुल्क राजस्व से जो धन राशि मिली है, वह दूषित है। हम कह सकते हैं कि उनका सारा काम दूषित है, क्योंकि वह दूषित धन पर निर्भर हैं। हम पिछली बातें छोड़ें, वर्तमान हमारे सामने है। इस बात में कोई शक नहीं है कि अब उन्हें उत्पाद शुल्क नहीं मिलेगा। यही नहीं कि वह अधिक उत्पाद शुल्क नहीं प्राप्त करते हैं, बल्कि हकीकत यह है कि जो उन्हें मिलता था, वह भी छोड़ रहे हैं। मेरे
ख्याल से स्टाम्प से उन्हें कुछ ज्यादा नहीं मिलेगा। इस स्रोत से वह अधिक की आशा भी नहीं रखते हैं। इसलिए हमारे विचार से जहां तक आगे के सालों का संबंध है, इन दो मदों को जिन्होंने बचत को बढ़ा दिया है, भूल जाना चाहिए। आयकर की प्राप्ति हो भी सकती है और नहीं भी। यह भी एक आकस्मिक मद है। इसलिए जहां तक भविष्य